दिल मे कुछ भाव उमड़े और जब कौतूहल बढ़ा तो ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया । ये सिलसिला अभी तक तो बद्दस्तूर जारी है। जब भी कुछ नया या पुराना कोई किस्सा दिल मे हलचल पैदा कर बैचेनी बढाने लगता है तो उसे लिखकर कुछ शुकुन हासिल होता है। मगर कभी खुद ही यादों की राख़ टटोलकर चिंगारी खोंजने की नाकाम कोशिश करता हूँ। बस यही फलसफा है ।
Monday, 14 December 2015
Saturday, 12 December 2015
तेरी दुल्हन
रोहित स्कूल से घर आया तो अपनी माँ के पास काफी देर से एक खूबसूरत युवती को बैठे देखकर
माँ उसके मनोभावों को भांपते हुये मुसकराकर बोली ,”तेरी दुल्हन ”
वक़्त खिसकता रहा......बीस साल पुरानी यादें उसके गाँव आते ही ताज़ा हो जाती। आज फिर रोहित करीब दो साल बाद अपने गाँव आया। अपने घर की साफ सफाई करवाकर वो निखिल के घर की तरफ बढ़ गया। वो जब भी गाँव आता खाना निखिल के घर ही खाता था। काकी उसे निखिल की तरह प्यार से खाना खिलाती ।
नहीं ,मुझे अचानक जाना पड़ रहा है , आंटी को बोल देना ।
युवती रोहित के साथ साथ चलने लगी। ,“आपने मेरी मम्मी को देखा था ? कैसी दिखती थी वो ?”
- "विक्रम"
पूछा, “ये कौन है माँ ? “
माँ उसके मनोभावों को भांपते हुये मुसकराकर बोली ,”तेरी दुल्हन ”
रोहित शरमाकर दूसरे कमरे मे चला गया ,युवती भी शरमाकर रोहित को जाते हुये देखने लगी।
शालिनी पड़ोस के घर मे अगले हफ्ते होने वाली एक शादी मे शामिल होने आई थी। रोहित को जब पता चला तो वो स्कूल से आते ही पड़ोस के घर मे अपने दोस्त निखिल के पास किसी न किसी बहाने चला जाता। निखिल से पता चला वो उसके मामा की बेटी है ।
रोहित जब भी निखिल से मिलने आता , शालिनी भी किसी न किसी बहाने उन दोनों के पास आ जाती। रोहित और शालिनी छुपकर एक दूसरे को देखते रहते ।
“तेरी दुल्हन” , माँ के कहे ये शब्द रोहित और शालिनी को बरबस ही मुस्कराने पर मजबूर कर देते। धीरे धीरे दोनों ने एक दूसरे से औपचारिक बातचीत शुरू की । शादी की भीड़भाड़ से बचने के लिए वो छत पर चले जाते। देर तक बातें करते रहते।
शालू !, किसी ने पुकारा तो शालिनी उठते हुये राहुल का हाथ पकड़कर चुटकी बजाते हुये हँसकर बोली, ”जाना मत , मैं बस यूँ आई ।” कहते हुये नीचे की तरफ दौड़ गई ।
शादी का दिन नजदीक आ चुका था , मेहमानों की भीड़भाड़ के चलते दोनों युवा मिलने की जगह तलाशते रहते थे।
आखिरकार शादी का दिन भी आ गया और दुल्हन की विदाई का भी । दुल्हन की विदाई के दूसरे दिन मेहमान भी जाने लगे और उनके साथ ,रोहित की "दुल्हन" भी विदा होने लगी। रोहित एक तरफ खड़ा शालिनी को अपने रिश्तेदारों के साथ जाते हुये देखता रहा। शालिनी की निगाहें रोहित को तलाश रही थी।
नजरें मिली ,दोनों की आँखों में नमी साफ देखी जा सकती थी।
वक़्त गुजरता गया । मगर रोहित शालिनी को नहीं भुला पाया। वो शालिनी का इंतज़ार करता रहा। साल-दर-साल गुजरते गए । उसने शालिनी के प्रति अपने आकर्षण का जिक्र किसी से नहीं किया , यहाँ तक की अपने दोस्त निखिल को भी कुछ नहीं बताया । पढ़ाई पूरी करने के बाद रोहित को एक सरकारी नौकरी मिल गई। नौकरी लगने के बाद रोहित की माँ ने शादी के लिए लड़कियां देखनी शुरू की मगर रोहित किसी ना किसी बहाने टालता रहा। वो माँ को नहीं कह पाया की माँ , “मेरी दुल्हन तो आपने बचपन मे ही तलाश ली थी ,फिर अब किसकी तलाश है ? “
सरपट दौड़ते वक़्त के एक हादसे में उसकी माँ भी चल बसी । पिता तो बचपन मे ही चल बसे थे। सालभर मे एक बार शहर से अपने गाँव आता तो निखिल के घर जरूर जाता। निखिल की माँ से उसे अपनी माँ सा प्यार मिलता था। निखिल की माँ भी उसे शादी करने को कहती रहती मगर वो हँसकर टाल देता।
“अब चालीस को पार कर चुका , फिर क्या बुढ़ापे मे शादी रचाएगा ?”, निखिल की माँ डांटकर कहती।
“कर लूँगा काकी , अभी कौन सी जल्दी है”, वो बीमार सी हंसी हँसकर बात को उड़ा देता।
काकी को देखकर रोहित ने चरण-स्पर्श करके काकी का आशीर्वाद लिया और बरामदे मे रखी कुर्सी पर बैठ गया। काकी भी उसके पास बैठ गई और बातें करने लगी। तभी घर के अंदर से एक युवती आई जिसे देखकर रोहित उठ खड़ा हुआ और बोला ,”शालू !”
युवती ने रोहित को देखा और फिर काकी की तरफ देखकर बोली ,”हाँ दादी माँ , आपने बुलाया ।”
“अरे हाँ,बेटी ये रोहित है निखिल का दोस्त , तुम इसको चाय नाश्ता दो तब तक मैं बगल वाली आंटी से आम का अचार लाती हूँ ,इसको बहुत पसंद है । काकी उठकर बाहर चली गई ।
“आप बैठिए, मैं बस यूँ लाई”, युवती ने रोहित की तरह देखते हुये हँसकर चुटकी बजाई खिलखिलाती हुई घर के अंदर चली गई।
रोहित बूत बना खड़ा सोचता रहा , उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
काकी पड़ोस से आ चुकी थी। तब तक युवती भी चाय लेकर आ गई तो रोहित ने युवती की तरफ इशारा करते हुये पूछा ,”काकी ये ..... ? “
“बेटा ये निखिल के मामा की बेटी, शालिनी की बेटी है। बिलकुल माँ पर गई है। मुझे “दादीमाँ “ कहती है । मगर अभागी है , इसके जन्म के वक़्त ही शालिनी की मौत हो गई थी ।
रोहित के कानों में सीटियाँ बजने लगी, वो भारी कदमों से अपने घर लौट आया । अपना सामान उठाकर जैसे ही शहर जाने के लिए घर से बाहर आया सामने उस युवती को खड़े देखकर सकपका गया।
“तुम ?”, रोहित से पूछा ।
दादी माँ आपको खाने के लिए बुला रही है ।
नहीं ,मुझे अचानक जाना पड़ रहा है , आंटी को बोल देना ।
युवती रोहित के साथ साथ चलने लगी। ,“आपने मेरी मम्मी को देखा था ? कैसी दिखती थी वो ?”
रोहित अपने आंसुओं को रोकता हुआ शहर जाने वाले रास्ते की तरह बढ़ गया।
- "विक्रम"
Thursday, 3 December 2015
वक़्त
वक़्त
निरंतर रौंदें
जा रहा है ,
और ....मै ,
अविरल
निकालता रहता हूँ ,
तेरी धूल-धूसरित
विदित-अविदित
यादों को ,
और रख लेता हूँ
सिलसिलेवार
ज़हन में ।
चलता रहता है ये खेल
अविच्छिन्न ....
अविरत ....
अनवरत ....
"विक्रम"
निरंतर रौंदें
जा रहा है ,
और ....मै ,
अविरल
निकालता रहता हूँ ,
तेरी धूल-धूसरित
विदित-अविदित
यादों को ,
और रख लेता हूँ
सिलसिलेवार
ज़हन में ।
वक़्त…और,
मेरे दरमियाँ,चलता रहता है ये खेल
अविच्छिन्न ....
अविरत ....
अनवरत ....
"विक्रम"
Wednesday, 25 November 2015
मुद्दे
जुगालियाँ करते हैं लोग ,
मुद्दों की दिन-रात,
आदि हो गए है चबाने के,
कोई एक जन,
किसी के हलक से,
तो कोई
अखबार की कतरनों से,
उठा लाते हैं ताज़ा या बासी मुद्दे ,
और उछाल देते है
हवा मे,
छीना-झपटी के दरमियाँ,
बदल जाते हैं मायने मुद्दों के ।
दमदार दलीलें
बदल देती हैं,
मुद्दों के अभिप्राय !
"विक्रम"
Sunday, 18 October 2015
बड़ी बहू
बड़ी बहू
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आज फिर सामने वाले घर से सास दयावती अपनी बड़ी बहू मीना पर चिल्ला रही थी,जो इस बात का संकेत था की अब बड़ी बहू पर उसके पति भीमा के हाथों ,दरवाजे के पास कुत्तों को भगाने के लिए संभालकर रखी हुई छड़ी बरसने वाली हैं । सास दयावती अपने नाम के विपरीत स्वभाव वाली औरत थी , जिसे अपनी मंदबुद्धि बड़ी बहू मीना फूटी आँख ना सुहाती थी । पाँच साल पहले मीना के मायके वालों से अच्छा दहेज मिलने का प्रलोभन मिला तो झट से अपने अनपढ़ बड़े बेटे भीमा की शादी मंदबुद्धि मीना से कर दी थी । भीमा की शादी के एक महीने बाद ही उसके छोटे भाई सागर ,जो फौज मे नोकरी करता था,की शादी भी करदी गई । चूंकि मीना के हाथ का बनाया खाना कोई खाना नहीं चाहता था और भीमा की माँ दयावती के पैरों की तकलीफ के चलते कोई खाना बनाने वाला नहीं था । मीना को पूर्णरूप से मंदबुद्धि कहना भी न्यायोचित नहीं होगा , हाँ वो भोली जरूर थी। भीमा जब भी खेत से आता तो वो सबसे पहले उसके लिए नहाने को गर्म पानी और तौलिया रख देती , जब तब भीमा नहाता वो उसके आगे पीछे घूमती रहती। नहाने के बाद कटोरी मे हल्का गर्म किया सरसों का तेल लेकर उसके पैरों की मालिश करती । दिनभर मैली कुचैली साड़ी को लेपेटे पशुओं के चारे पानी से लेकर घर के झाड़ू –फटके मे व्यस्त रहने वाली मंदबुद्धि कैसे हो सकती है ?
उस से रसोई का काम नहीं करवाया जाता ,यहाँ तक की उसके खाने का बर्तन भी अलग से उसके कमरे मे पड़ा रहता जिसमे घर के बच्चे बचा हुआ खाना डाल देते थे। जब भीमा के खाना खाने का वक़्त होता तो मीना वहाँ से हट जाती । छोटी बहू एक हाथ से घूँघट और एक हाथ से थाली पकड़े चारपाई पर बैठे भीमा को खाना देती और फिर छोटी बहू के बच्चे भीमा के साथ ही खाने लगते जिनहे भीमा बहुत प्यार करता था । मीना अपनी पाँच साल की इकलौती बेटी लाली को गोद मे बैठाये भीमा और बच्चों को खाना खाते देखकर मुस्कराती रहती । भीमा खाना खाने के बाद घर के बाहर आहते मे जाकर सो जाता और मीना अपनी बेटी का हाथ पकड़ अपने कोठरीनुमा कमरे मे ले जाती और दोनों माँ बेटी कोने मे एक बर्तन मे पड़ा खाना खाकर वहीं नीचे जमीन पे सो जाती । यही दिनचर्या थी जिसमे कभी कोई बदलाव नहीं होता था। भीमा का शादी की पहली रात के बाद अपनी पत्नी मीना,और जन्म से अपनी बेटी मे कोई दिलचस्पी नहीं थी । उसका मीना से बस इतना संबंध था की जब भी उसकी माँ दयावती किसी बात को लेकर मीना से लड़ाई झगड़ा करती तो भीमा एक रस्म की भांति दरवाजे के पास यथावत रखी छड़ी उठाता और मीना की पीठ और टांगों पर जी भरके बरसाकर उसे फिर से वहीं रख देता । अपनी चीख़ों को दबाये मीना अपने कमरे मे डरी सहमी बेटी को सिने से लगा ढाढ़स बंधाने लगती।
“खड़ी हो कलमुँही दिन निकल आया “,सास दयावती ने मीना की कमर पर लात मारते हुये कहा ।
“जी ...जी माजी”, कहती हुई मीना ने कोने पे पड़ी झाड़ू उठाई और घर के बाहर अहाते मे तेजी से झाड़ू लगाने लगी। वहीं बाहर चबूतरे पर बैठा भीमा नीम की दातुन से अपने दांत रगड़ रहा था। मीना ने झाड़ू लगाते लगाते भीमा के चारों तरफ चाय का कप ना देखकर कहाँ ,”आज आपको चाय नहीं मिली जी ?“।
“पी चुका ” , भीमा ने थूकते हुये रूखे स्वर मे कहाँ और फिर से अपने दांत रगड़ने लगा ।
मीना जल्दी जल्दी अपना काम निपटा रही थी। छोटी बहू रसोई मे सबके खाने के इंतजाम मे जुटी थी , सास अपनी चारपाई पर बैठी माला फेरते हुई आँगन मे झाड़ू लगाती मीना को देख अलग अलग तरह के मुँह बना रही थी । मीना रसोई के आस पास बार बार झाड़ू मार रही थी ,की शायद छोटी बहू कुछ खाने पीने को दे दे । छोटी बहू अपने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करते करते हुये मीना से बोली ,”भैंसों को चारा डालकर आ उनके दुहने का वक्त हो गया”।
“बिना कहे इस महारानी को समझ थोड़े ही आता है “,सास दयावती ने चाय की चुस्की लेते हुये छोटी बहू की बात का समर्थन करके मीना की तरफ आंखे तरेरते हुये कहा ।
मीना झाड़ू को अपने कमरे मे रख नींद में सोई अपनी बेटी के सिर पर हाथ फिराकर घर के पिछवाड़े में पशुओं की देखभाल करने निकल गई।
भीमा ने दूध की बाल्टी माँ के पास रखी और खेतों मे निकल गया। दोपहर तक सीमा भी पशुओं की देखभाल के बाद अपनी मैली साड़ी से पसीने पोछते हुये अपने कमरे मे आ गई जहां उसकी बेटी कोने मे पड़े बर्तन में खाना खा रही थी।
वक़्त बदलाव की आश मे निरंतर बीत रहा था।
आज 30 सालों बाद हालात बिलकुल बदल चुके थे । भीमा का भाई सागर नोकरी से रिटायर्ड होकर घर आ चुका था , दोनों भाईयों मे घर का बंटवारा हो चुका था। घर सागर ने कब्जा लिया था और भीमा और मीना को घर के पिछवाड़े मे पशुओं के बाड़े के पास बने कच्चे मकान मे भेज दिया था । मीना की बेटी की शादी हो चुकी थी जो अपने ससुराल मे खुश थी। सास दयावती का भी भगवान के घर से बुलावा आ चुका था। भीमा काफी बूढ़ा हो चुका था और अस्वस्थ भी रहता था । मीना उसका पूरा ख्याल रखती थी। कभी मीना की परछाई से नफरत करने वाला भीमा अब बुढ़ापे मे मीना की हाथों से बनी रोटियाँ बिना ना-नुकर के खा रहा था। सागर के वो छोटे बच्चे जो अब बड़े हो चुके थे और जो कभी भीमा से चिपके रहते थे, वो अब भीमा की तरफ देखते भी नहीं ।
कुछ वर्षों बाद कमजोरी और बीमारी से भीमा भी चल बसा और मीना को उसकी बेटी अपने साथ लेकर अपनी ससुराल आ गई । मीना अब चारपाई पर बैठी रहती है । उसकी बेटी अपनी बूढ़ी माँ को वो सब सुख दे देना चाहती है जिनसे उसकी माँ सदा महरूम रही थी।
"विक्रम"
Saturday, 17 October 2015
भूला
घर की चौखट पे
दोनों हाथ टिकाये
वो आज भी उस गली के
दूसरे छोर तक नज़रों
को बिछाये बैठी है ,
जिस गली से गुजरकर
मुद्दतों पहले कोई
चला गया......
शामों को अक्सर
हल्के अंधरे में ,
गली से गुजरता हर
साया उसे
जाना-पहचाना सा
नज़र आता ,
मगर पास आने पर....
उसकी नजरें फिर से
गली के आख़िरी छोर
पर लौट जाती ,फिर से
किसी भूले को घर
वापिस लाने ......
"विक्रम"
Saturday, 3 October 2015
मौन स्वीकृतियाँ
अधबुने शब्दों की
तुम्हारी मौन स्वीकृतियाँ,
दर्ज़ हैं ,ज़हन की
गहन स्मृतियों में...
मैं अक्सर,
अन्तर्मन के विद्रोह
में उलझा रहा,
और जूझता रहा
विकल्पों की भ्रांतियों में....
कालकल्पित ख्वाबों के
जीर्ण शीर्ण आधार ,
जीर्ण शीर्ण आधार ,
बहुत पीछे छोड़ दिये
वक़्त की स्फूर्तियों ने....
“विक्रम”
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