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Saturday, 4 February 2017

रोबिन हुड श्री बलवन्त सिंह बाखासर

राजस्थान में ये नाम किसी पहचान का मोहताज नही बच्चा बच्चा जानता है सीमावर्ती गाँव बाखासर को और वहाँ के रोबिन हुड श्री बलवन्त सिंह जी । दरअसल 60 और 70 के दशक के पश्चिमी राजस्थान के सबसे बड़े डकैत जिनसे बोर्डर पार पाकिस्तानी भी ख़ौफ़ खाते थे।  दरअसल कितनी ही बार पाकिस्तानियो को गाय चोरी कर पाकिस्तान ले जाते उन्होंने रोका था।  कुछ एक को तो गोली से भी उड़ा दिया था।  1971 में युद्ध हुआ भारत पाक के बिच तक सेना को डाकू बलवन्त सिंह याद आये खुद ब्रिगेडियर भवानी सिंह बलवन्त सिंह से जाकर मिले और सेना को मदद करने की गुहार की ।

 कारण बलवन्त सिंह का ननिहाल भी पाकिस्तान था, सो वे पाकिस्तानी हिन्दुओ को बातचीत कर भारत के पक्ष में कर पाये एवम् पाक के गाँव गाँव चप्पे चप्पे का रास्ता बलवन्त सिंह जी जानते थे।  सो सेना को भी उम्मीद थी की बहुत बड़ी मदद मिल सकती थी।  बेझिझक बलवन्त सिंह जी सेना के साथ खड़े हुए अपनी पूरी डकैत टीम के साथ खुद उन्होंने बोर्डर पर मोर्चा सम्भाला एवम् उनकी सबसे बड़ी कामयाबी रही।  पाकिस्तान के छाछरो मिट्ठी थरपारकर  गाँवो के हिन्दुओ को एकत्रित किया और मनाया की इस युद्ध में भारतीय सेना का साथ दिया जाए।  उक्त गाँवों के लोगो ने बिना शर्त खुलकर भारतीय सेना का साथ दिया।  और पाकी सेना के एक एक ठिकाने की बंकर  की पूरी जानकारियां इंडियन आर्मी को दी जिस कारन हम 1971 में एक बड़ी जीत हासिल कर पाये।  बाद में खुद तत्कालीन प्रधान मंत्री तक बलवन्त सिंह जी बाखासर द्वारा मदद के किस्से पहुंचे तो उन्होंने बलवन्त सिंह जी के सर पर जितने भी डकैती के केस थे सब फौरन हटाने की कार्यवाही की।  

 
4 October 2016 को भारतीय सेना एक बार फिर बलवन्त सिंह जी के घर पहुंची और उनके पोत्र रतन सिंह जी से मिली और आह्वान किया की अगर युद्ध होता है आपसे अनुरोध करते है आपके गाँव और आसपास के गाँवों को तैयार करे ताकि वे फिर से सेना की मदद कर सके।

Friday, 13 January 2017

मेड़तिया राठौड़ ( भाग -4 )

---भाग 3 का शेष...


11. बलुन्दा-जिला पाली, गाँव साढ़ेसात, कुरब हाथ, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार,
     रेख  19375 रु.। चाँदावत मेड़तिया।

12. मोंडा-जिला नागौर, गाँव 181/2 कुरब हाथ दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार 
      रेख 34803   रु.। रूघनाथसिंघोत मेड़तिया। 
13. बोरावड़-जिला नागौर,इकेवड़ी  ताजीमगांव4, रेख 13000 रु.। केशोदासोत मेड़तिया।
14. पाँचवा-जिला नागौर,गांव 18  कुरब हाथ,दोवड़ी ताजीमरेख26000 रु.। गोयन्ददासोत  मेड़तिया।
15. पाँचोता (पानाशक्तिसिंह) -जिला नागौर, इकेवड़ी ताजीमकुरब हाथ,रेख 13385 रु.  गांव 
      पौने  सात। गोयन्द दासोत मेड़तिया।
16. पाँचोत(पाना उम्मेदसिंह) -जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, गांव सवा नौ,
       रेख     22375 रु.।    गोयन्ददासोत मेड़तिया।
17. चाँदारूण-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ,गांव6, रेख 9850 रु.। माधोदासोत   मेड़तिया।
18. बरकाना-जिला पाली, कुरब हाथ जागीर इकेवड़ी रेख 10000  रु. गांव 91 गोपीनाथोत मेड़तिया।

19 सरगोठ-जिला नागौर, इकेवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, गांव सवा आठ, रेख 22500  गोयन्ददासोत
     मेड़तिया।

20. कुड़ल-जिला पाली, इकेवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, गांव 6, रेख 16500 रु.।
    चांदावत   मेड़तिया।

21. मनाणा-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, गांव 8, रेख26700 रु.
    कुरब  हाथ। मेड़तिया।

22. सबलपुर-जिला नागौर, इकेवड़ी ताजीम, तीसरे दर्जे के अदालती अधिकार, गांव 5, रेख 18250,
      कुरब  हाथ। केशोदासोत मेड़तिया।
23. बेरी-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ,गांव 10/12, रेख 29244 रु.मेड़तिया।
24. दोबड़ी बड़ी-जिला नागौर। महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर पर अधिकार के बाद श्री
      जगराम  माधवदासीत को यह जागीरप्रदान की। जोधपुर महाराजा हनुवन्तसिंह  ने  ताजीम व
     सोना प्रदान कर ठाकुर सवाईसिंह जी दोबड़ी को  सम्मानित किया। माधोदासोत  मेड़तिया
      ठिकाना है।
25. रायण-जिला नागौर,रेख 14000 रु.कुरब  हाथ,इकेवड़ी ताजीम । रायमलोत मेड़तिया।

26.सेवरिया-जिला पाली, कुरब बांह, गाँव 4, ताजीम इकेवड़ी ताजीम,रेख 10875 रु.   
    चाँदावत  मेड़तिया।
27. सुमेल-जिला नागौर, गाँव 7, कुरब बांह, ताजीम इकेवड़ी,रेख 14000 रु.ईशरदासोत     मेड़तिया।
 
28. मंगलाणा-जिला नागौर, गाँव 7, कुरब  बांह, ताजीम इकेवड़ी, रेख 12625.50 रु.  गोयन्ददासोत। 28. बाजोली-जिला नागौर,गाँव2, कुरब  बांह,इकेवड़ी ताजीम,रेख8225 रु.। माधोदासोत     मेड़तिया।
 
29. बिदीयाद-जिला नागौर, गाँव 2, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम,रेख9000 रु.। सुरताणोत  मेडतिया ।
31. रोहंडी-जिला नागौर, गाँव 3, इकेवड़ी, ताजीम कुरब  बांह,रेख 10500 रु.। सुरतांणोत    मेड़तिया।

32. सरनावड़ा-जिला नागौर, गाँव पौने चार, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम, रेख 10600  गोयन्ददासीत
      मेड़तिया।
33. नवो-जिला नागौर, गाँव साढे तीन, कुरब हाथ, इकेवड़ी  ताजीम,रेख 18012 रु.। 34.
       धनकोली-जिला नागौर, कुरब बांह, दोवड़ी ताजीम, रेख 7000 रु.। गोयन्ददासोत मेड़तिया।
35. तोसीना-जिला नागौर, गाँव 3, कुरब हाथ, ताजीम इकेवड़ी,रेख 9500 रु.। सुरताणोत   मेड़तिया।
36. केराप-जिला नागौर, गाँव 3, ताजीम इकेवड़ी,रेख 8500 रु.। 
37. भदलिया-जिला नागौर, गाँव 4, कुरब बांह, ताजीम  इकेवड़ी, रेख 13000 रु.।
       गोयन्ददासीत मेड़तिया।
38. बांसा-जिला नागौर, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम, गाँव5, रेख 12512 रु.।
39. नाराणपुरा-जिला नागौर, गाँव 8, कुरब हाथ, ताजीम  इकेवड़ी, रेख 15925 रु.। गोयन्ददासीत
      मेड़तिया।
40. जौलिया-जिला नागौर, गाँव साढ़े तीन, कुरब बांह, इकेवड़ी  ताजीम, रेख 7317  गोयन्ददासोत
       मेड़तिया।
41. अभयपुरा-जिला जोधपुर, गाँव पोने सात, कुरब हाथ, ताजीम  दोवड़ी,रेख 9889 रु.।
42. मीठड़ी-जिला नागौर, गाँव सवा ग्यारह, मीठड़ी ठिकाने की कुल रेख 33400  रु. में से 15000 रु.
     की रेख व ताजीम जब्त कर ली गई थी।
43. खोड़-जिला पाली, गाँव 5, कुरब हाथ, ताजीम इकेवड़ी।
44. फालना-जिला पाली, गाँव साढ़े आठ, कुरत हाथ, इकेवड़ी जागीर, रेख 11600 रु. गोपीनाथोत
     मेड़तिया।
45. बोरुन्दा-जिला पाली, कुरब बांह, इकेवड़ी ताजीम, रेख6250 रु.।
46. टांगला-जिला नागौर, कुरब बांह, ताजीम इकेवड़ी,रेख 6500  रु.।
इनके  अलावा मारवाड़ में  मेड़तियों के अनेकों  ताजीमी ठिकाने थे। ठिकानों में प्रमुख लूणवा व नीबोद  माधोदासोत के मेड़ास, वीजाथल ,  चीखरणीयावड़ो,  ईडवा, सुरियास,  कीतलसर, का नीबी खास, द्वारकादासोत  का  बछवारी, सनदासोतों  के खोड़कास, तामड़ोली,  वा,तिलागेस  आदि ठिकाने थे।   मेड़तिया राठौड़ों का मेवाड़ में प्रसिद्ध ठिकाना था बदनौर। बदनौर-यह ठिकाना वीरवर  जयमल मेड़तिया को जागीर में  राणा  उदयसिंह ने प्रदान किया था। जो उनकी मृत्यु के  बाद उनके  पुत्र  मुकुन्ददास एवं  उनके  वंशजों के अधिकार में रहा। अत: ये अपने को टीकाई भी मानते हैं।  मेवाड़ राज्य का यह प्रथम श्रेणी का ठिकाना था।  इसकी गिनती मेवाड़ के प्रमुख सौलह उमरावों में थी। इसे हासिल लगान वसूली एवं दीवानी व फौजदारी के उच्च अधिकार प्राप्त थे।
अजमेर मारवाड़ के ठिकाने
मसूदा-जगमाल के अधिकार  में मेड़ता था। उसके पुत्र हनुवन्त सिंह को बादशाह अकबर ने ई.1558 में मसूदा ठिकाना मनसब में  दिया। उन्होंने मसूदा पंवारों से विजय किया (अजमेर पृ.289) उनके  छोटे भाई लालसिंह ने बागसुरी बसाई। उनके बड़े भाई कल्लाजी के वंश में जयपुर में  बूढ़ा देवल का ठिकाना था। अजमेरा के ठिकानों में मसूदा आमद में सबसे बड़ा ठिकाना था जिसे ज्यूडिशियल अधिकार प्राप्त थे। मसूदा ताजीमी इस्तमुरार ठिकाना था। मसूदा  के राव विजयसिंह बड़े प्रगतिशील शासक थे। इनको विशेष योग्यता के कारण मेयो कॉलेज से सोर्ड ओफ ओनर दिया गया था।
राव विजय सिंह के पुत्र राव नारायण सिंह सन् 1952 के प्रथम चुनाव में अजमेर असेम्बली के सदस्य चुने गये। आप राजस्थान विधान सभा के लम्बे असें तक सदस्य रहे हैं। 15 साल तक राजस्थान मन्त्रीमंडल के विभिन्न पदों पर रहे तथा राजस्थान विधान सभा के उपसभापति भी रहे हैं। राव साहब भारतीय दर्शन के विद्वान और हिन्दी के श्रेष्ठ लेखक हैं। आपकी वेदान्त पर कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं।
रानी उर्मिला देवी जी मसूदा राजस्थान समाज कल्याण  बोर्ड की अध्यक्षा रह चुकी हैं। आपके बड़े पुत्र इन्द्रजीतसिंह दो बार विदेशों के  राजदूत रह चुके हैं।
बाघसुरी-अजमेर मेरवाड़ा  का मेड़तियों का दूसरा ताजीमी इस्तमुरार ठिकाना था। मसूदा के हनुवन्तसिंह के छोटे भाई लालसिंह ने जंगल में बाघ और सूअर को लड़ते देखा। सूअर ने बाघ को जिस स्थान पर पछाड़ा था उसी जगह गड़ें बनवाकर  गाँव बसाया जिसका नाम बाघसुरी रखा ।
जनरल नाथूसिंह-डुंगरपुर  राज्य के ठिकाना गुमानपुरा के निवासी ले. जनरल नाथूसिंह हुतियागी हैं। स्वभाव  सेनाके हासमेंआने सशक या वृद्धि की है।
भगवानपुरा के ले. जनरल  कल्याणसिंह जालिमसिंहोत मेड़तिया एक सुयोग्य जनरल थे। यह समाज सेवा में भी बड़ी रुचि लेते थे। दमोई के मेड़तिया गोविन्दसिंह  ब्रिटिश सेना में अधिकारी थे।  प्रथम विश्व युद्ध में साहसिक कार्य के लिए उन्हें विक्टोरिया क्रास सैनिक सेवा का सर्वोच्च पदक मिला था।
मेड़तिया राठौड़ जहाँ  मेवाड़ की गौरव गरिमा और स्वतन्त्रता के लिए चित्तौड़ के तृतीय साके में,मारे गए थे उसी प्रकार महाराजा  रामसिंह जोधपुर और उनके चाचा राजाधिराज  बख्तसिंह के  पारस्परिक गृहकलह, मरहठों की मारवाड़ की मेड़ता की लड़ाई आदि में भी काम आये थे। मेड़तियों  की अकेली रघुनाथसिंहोत प्रशाखा के ही वीरमारवाड़ के शासकों की ओर से बहुसंख्या में रण में जूझ मरे हैं।

महाराजा रामसिंह के पक्ष में  मीठड़ी के ठाकुर  सगतसिंहकुचामन के ठाकुर जालिमसिंह, ठाकुर देवीसिंह पांचौता  का ठाकुर, कुंवर चैनसिंह सुद्रासरण वालों का पूर्वज, कुंवर नाहरसिंह इन्द्रसिंघोत मारोठ, बैरीशाल इन्द्रसिंहोत, देवीसिंह शंभुसिंहोत, दुर्जनसिंह  शंभूसिंहोत पांचोता,सरगोढ़, आदि रघुनाथसिंह की संतति के कई ठिकानों के ठाकुर और कुंवर मारे गए थे।    मेड़तिया राठौड़ों ने देश  व धर्म के लिए जब भी आव्हान किया गया अपना सर्वस्व न्यौछावर  किया है। आजादी  के  बाद  इन्होंने  लोकतांत्रिक  प्रवृतियों   में भाग  लेते  हुए देश व राज्य की सेवा  की है। राव नारायणसिंह जी मसूदा व रानी साहिबा उर्मिला देवी के  अलावा श्री गोपाल  सिंह गोठड़ा , श्री भैरुसिंह बरकाना, श्री कर्नल गोपाल सिंह बदनोर ,श्री विजय सिंह  राजपुरा, श्री उम्मेद सिंह खोजाबास (दो बार) व श्री विजेंद्र सिंह बदनोर  (दो बार) राजस्थान विधान सभा के सदस्य रहे हैं, तथा प्रांत की शासकीय प्रक्रिया मे जिम्मेदार भागीदारी का निर्वाह किया है।


 




[          भाग-1            भाग - 2              भाग - 3             भाग -4      ]
लेखक - देवी सिंह मंडावा
(क्षत्रिय राजवंशों का इतिहास)


 

मेड़तिया राठौड़ ( भाग -3 )

अकबर ने चन्द्रसेन के भाई मोटा राजा उदयसिंह को जोधपुर राज्य प्रदान किया। मोटा राजा के समय में जोधपुर व मेड़तियों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित हुए और पीढ़ियों का वैर समाप्त हो गया। मेड़तियों को अनेक जागीरें प्रदान की गई। मोटाराजा सुरताण व राजसिंह मेड़तिया ने गुजरात के बागी सुल्तान मुजफ्फर खां पर शाही सेना के साथ 1583 ई. में आक्रमण किया। मुजफ्फर खां परास्त होकर भाग गया।

 सुरताण की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बलभद्र आधे मेड़ता का शासक बना उसके कोई सन्तान नहीं थी। अतः अनुज गोपालदास को आधा मेड़ता का अधिकार मिला। गोपाल और केशवदास तीन सदी के मनसबदार थे।

1599 ई. में हबसियों ने बीड़ पर आक्रमण किया। बीड़ के अधिकारी शेरख्वाजा ने इसका वीरता से मुकाबला किया। शाही सेना की ओर से मेड़ता के शासक केशवदास व गोपालदास पराक्रम पूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनके अलावा कई मेड़तिया काम बीड़ के युद्ध में मारे जाने के बाद गोपालदास का पुत्र जगन्नाथ और केशवदास का पुत्र कान्हादास गद्दी पर बैठे जिन्हें आधा-आधा मेड़ता मिला।


कान्हदास की 1604 ई. में मृत्यु के पश्चात् उसके हिस्से का आधा मेड़ता जगन्नाथ को दे दिया। किन्तु अहमदाबाद में 1609 ई. में उसकी भी मृत्यु होने पर मेड़ता राजा शूरसिंह जोधपुर को प्राप्त हुआ। इस प्रकार मेड़ता तो मेड़तियों के हाथ से निकल गया किन्तु परगने की जागीरों पर मेड़तियों का अधिकार बना रहा।

मेड़तिया राजपूतों ने जहाँ शाही सेना में रहकर कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया वहीं ब्राह्मणों की रक्षार्थ अबू से संघर्ष किया और बलून्दा रामदास चांदावत व उनके पौत्र जैतसिंह मेड़तिया ने प्राणों की आहुती दी।

 
खानजहाँ लोदी द्वारा बादशाह शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह में फरवरी 1630 ई. को राजा राजसिंह की सेना में मेड़तिया राठौड़ों की सेना का संचालन गिरधरदास केशवदासोत मेड़तिया ने किया। 1683 ई. में राजा गजसिंह की मृत्यु के बाद महाराजा जसवन्त सिंह को भी मेड़तिया राठौड़ों की अमूल्य सेवाएँ मिलती रही। मेड़तिया गोपालदास रीयां को जोधपुर का प्रधान नियुक्त किया गया जिन्होंने कंधार अभियान में भाग लिया था।

जयमल के वंशज रघुनाथसिंह मेड़तिया ने धरामात के युद्ध में औरंगजेब का साथ दिया था। बादशाह ने रघुनाथसिंह को मारौठ प्रदान किया। गौड़ राजपूतों को पराजीत कर मारौठ व आसपास के गाँवों पर रघुनाथसिंह ने अधिकार किया। रघुनाथसिंह को 1500 जात,900 सवार,500 दो अस्पा मनसब था।

 
मेड़तियों ने महाराजा जसवन्तसिंह के नेतृत्व में कोडोना (दक्षिण) व कपाड़ा के दरें में अफगानों से युद्ध किया। 28 जनवरी 1678 को पेशावर में देहान्त हो गया और उनकी रानियों ने दो पुत्रों अजीतसिंह एवं दलथंभन को 19 फरवरी 1679 को जन्म दिया। औरंगजेब ने अजीतसिंह को जोधपुर न देकर अमरसिंह नागौर के पौत्र इन्द्रसिंह को राज्याधिकार प्रदान कर दिया।

 

बादशाह के कपट विचारों का आभास होने पर बालक अजीतसिंह की रक्षा का भार उठाने में भी मेड़तिया राठौड़ पीछे नहीं रहे। भावी महाराजा की रक्षार्थ दिल्ली युद्ध में खरसिंह

 आलणियावास, मोहकमसिंह बलून्दा आदि कई मेड़तिया राठौड़ों ने अपना जीवन न्यौछावर किया ।

शाही आज्ञा से जब मेड़ता व आसपास के मन्दिरों को तोड़ा गया तो राजसिंह पुत्र ठाकुर प्रतापसिंह रीयां ने मेड़ता पर आक्रमण कर मुगलों को भगा दिया और मेड़ता की मस्जिदें तोड़ डाली। अगस्त 1679 में राजसिंह आलनियावास के नेतृत्व में मेड़तियों ने पुस्कर में मुगल सेना से युद्ध किया। वराह मन्दिर के सामने हुए इस घमासान युद्ध में राजसिंह के साथ रूपसिंह बेसरोली, गोकुलदास बीजीरूण, हठीसिंह नेणियाँ, केसरीसिंह (राजसिंह का भतीजा), आनंदसिंह रीयां अपने कतिपय योद्धाओं के साथ समरांगण में वीरगति को प्राप्त हुए। नवाब तहब्बर खाँ के साथ लड़ते हुए मेड़तियों, चांपावतों, उदावतों, जैतावतों व कच्छवाहा और भाटी योद्धाओं ने आत्मोसर्ग किया था।

 
महाराणा राजसिंह मेवाड़ ने अजीतसिंह जोधपुर को मेवाड़ में आश्रय प्रदान किया। औरंगजेब इससे नाराज हुआ और मेवाड़ पर 1679 ई. में आक्रमण कर दिया। शाही सेना जब देबारी घाटे में प्रविष्ट हुई तो बदनौर के कुञ्जयसिंह और सांवलदास मेड़तिया सहित कई मेड़तिया बन्धु युद्ध में काम आए जिनकी छत्रियाँ आज भी उनकी वीरती की गाथा कह रही हैं। गोपीनाथ घाणेराव ने मुगलों से बहुत युद्ध किये। इन्हीं के प्रयास से महाराणा जयसिंह एवं कुंवर अमरसिंह के बीच समझौता हुआ और राजपूत शक्ति नष्ट होने से बच गई।

सन् 1705 ई. में ठाकुर कुशलसिंह रीयां, विजैसिंह बलून्दा अपने सैनिकों सहित जालौर पहुँचकर शत्रु को पराजित कर भगा दिया और महाराजा अजीतसिंह के जीवन की रक्षा कर मेड़तियों ने स्वामी भक्ति का पूर्ण परिचय दिया।

मेड़तिया राठौड़ों के प्रमुख ठिकाने

1. घाणेराव-जि.पाली, गाँव 37, कुरव हाथ, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार रेख     37600 रु. गोपीनाथ मेड़तिया राठौड़। सन् 1692 ई.में घाणेराव के ठाकुर           गोपीनाथ        मेड़तिया के प्रयासों से मेवाड़ के महाराणा जयसिंह व कुंवर के बीच      समझौता हो जाने से   राजपूत शक्ति हास होने से बच गई। गोपीनाथ घाणेराव ने मुगलों से अनेकों युद्ध लड़े थे।

2. आलणियावास-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार, कुरब       हाथ,   गांव,4, रेख 13600 रु. साधोदासोत मेड़तिया। यह सिरायत ठिकाना था। जोधपुर के      बालक महाराजा अजीतसिंह के समय जब औरंगजेब बादशाह की सेना पुष्कर के मंदिरों का        विध्वंस          करने आई तब ठाकुर राजसिंह आलणियावास तीन दिन तक शत्रु सेना से घमासान युद्ध करते      हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

सन् 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में यहाँ के ठाकुर अजीतसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध देशी सेनाओं का साथ दिया था तथा उनके साथ पंजाब तक गये थे। अंग्रेजों ने आलणियावास पर अधिकार कर लिया तब ये शेखावाटी और बीकानेर इलाके में रहकर मारवाड़ पर हमले करते रहे थे। इनके पुत्र उदयसिंह के समय पुनः आलणियावास पर अधिकार हुआ।

3. रीयां-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार, कुरब हाथ, गाँव-8, रेख36103 रु.। माधोदासोत मेड़तिया। यह भी सिरायत ठिकाना था। रीयां के ठाकुर   शेरसिंहजी बड़े वीर थे। जोधपुर महाराजा अभयसिंह की मृत्यु के समय प्राण नहीं निकल रहे थे तब शेरसिंह जी रीयां ने पूछा कि आपके क्या चिन्ता है। महाराजा ने  कहा कि मेरा लड़का  रामसिंह अयोग्य हे और मेरी मृत्यु के बाद मेरा भाई बख्तसिंह   जोधपुर का राज्य रामसिंह से  छीन लेगा। इस पर शेरसिंह ने प्रतिज्ञा की कि मेरे जीते जी जोधपुर पर उनका अधिकार नहीं होने दूंगा।  हुआ भी यही शेरसिंह के युद्ध में काम आ जाने के बाद ही बख्तसिंह का  जोधपुर पर अधिकार हो सका।

4. कुचामण-जि. नागौर, गाँव 15, रेख 42750 रु. दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, अव्वल    अदालती अधिकार। गोयन्ददासोत मेड़तिया। स्व. राजा हरिसिंह जी बड़े योग्य व्यक्ति        थे। यह           मेड़तियों में सिरायत ठिकाना था।

कुचामन रघुनाथसिंह के खानदान में था। यहाँ के ठाकुर जालिमसिंह बड़े वीर थे। राजाधिराज बख्तसिंह नागौर और उनके भतीजे महाराजा रामसिंह जोधपुर के बीच जब युद्ध चला तब मेड़तिये रामसिंह के पक्ष में थे। एक युद्ध में जालिमसिंह मारे गये। उसके बाद बख्तसिंह और महाराजा गजसिंह बीकानेर की फौजे जोधपुर की तरफ बढ़ रही थी तो वर्षा के कारण तोपें काफी पीछे रह गई थी। गजसिंह ने तोपों को आगे लाने के लिए रुकने का प्रस्ताव किया तो बख्तसिंह ने कहा जालिमसिंह जैसे वीर के डर से तोपों को आगे रखना जरूरी था वे तो मारे जा चुके हें अब तोपें कहीं भी रहे कोई डर नहीं है। कुचामण हरिसिंह को महाराजा उम्मेदसिंह जोधपुर ने राजा की वंशानुगत पदवी प्रदान की थी।

 

5. चाणोंद-जिला पाली,गाँव26, कुरब हाथ, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती  अखतियार,    रेख 51000 रु.। गोपीनाथोत मेड़तिया। महाराणा रायमल जी ने अपने  दोहित्र प्रतापसिंह   वीरमदेवोत को यह जागीर प्रदान की थी।

6.बडू-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, दूसरे नम्बर के अदालती अखतियार, गाँव 12  कुरब   हाथ रेख 32750 रु. केशोदासोत मेड़तिया। ठा. दलीपसिंह प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं    जो प्रधान भी  रह चुके हैं।

 

7. बूड़सू-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, दूसरे नम्बर के अदालती अधिकार, गाँव 24,     कुरब   हाथ, रेख 37550 रु.। केशोदासीत मेड़तिया।

8. गूलर-जि.नागौर, दोवड़ी ताजीम,गाँव 5, रेख23250 । सुरताणोत मेड़तिया। 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े थे।

9.जावला-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, गाँव 81/2, कुरब हाथ, रेख 38000 रु.।   सुरताणोत मेड़तिया। ये जयमलजी के बड़े पुत्र सुरताण के वंशज हैं यह ठिकाना  मेड़तियों में टीकाई है।

10.भखरी-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ,रेख 17000 रु.। सुरताणोत मेड़तिया। एक बार जयपुर महाराजा जयसिंह ने जोधपुर पर चढ़ाई की। अन्त में दोनों राज्यों में सन्धि हो गई और जयपुर की विशाल सेना वापस रवाना हुई। महाराजा जयसिंह ने पुष्कर स्नान करने का विचार किया। वापस लौटते हुए जयपुर वालों ने ताना मारा कि हमारी तोपें तो भरी ही जा रही हैं कोई खाली कराने वाला ही नहीं मिला। इस पर भखरी के ठा. केशरीसिंह ने अचानक हमला कर उस हाथी को पकड़ कर भखरी ले आए जिस पर महाराजा जयसिंह जयपुर के पूजन का सामान था। जोधपुर के महाराजा जिस सेना का मुकाबिला नहीं कर सके उसका छोटे से ठिकाने भखरी ने सामना किया। महाराजा जयसिंह ने दो दिन तक सेना व तोपें भेजी लेकिन वो भखरी के किले पर अधिकार नहीं कर सकी। महाराजा जयसिंह बिना पूजा के भोजन नहीं करते थे। तीसरे रोज स्वयं महाराजा अपनी सारी सेना के साथ भखरी पहुँचे तब जाकर किले पर अधिकार हुआ।
 [          भाग-1            भाग - 2              भाग - 3             भाग -4      ]
 
-लेखक - देवी सिंह मंडावा

मेड़तिया राठौड़ ( भाग - 2 )


मीरांबाई-मीरां का जन्म वि.सं. 1555 में कुड़की ग्राम में हुआ था। ये राव दूदा जी की पौत्री और कुंअर रतन सिंह की एकमात्र सन्तान थी। मीरां जब दो वर्ष की थी तो इनकी माता का देहान्त हो गया। मीरां का पालन-पोषण व शिक्षा मेड़ता में राव दूदा जी की देखरेख में हुआ। राव दूदा ईश्वर भक्त थे जिनके संस्कारों का प्रभाव मीरां पर पडे बिना नहीं रहा।

मीरां की शिक्षा पंडित गजाधर की देखरेख में हुई। कुछ ही वर्षों में मीरां पूर्ण व पंडिता हो गई।

मीरां बाई के बारे में एक जनश्रुति प्रचलित हे कि रतनसिंह के घर एक साधु आया जिसकी कृष्णमूर्ति को देख मीरां ने मूर्ति के लिए हठ किया। साधु ने मूर्ति नहीं दी तो भगवानकृष्ण ने स्वप्न में दर्शन दे साधु को मूर्ति मीरां को देने का आदेश दिया। साधु ने मूर्ति मीरां को दी जिसे पाकर मीरां प्रसन्न हो गई तथा तभी से कृष्ण को अपना वर स्वीकार कर लिया। एकदूसरी जनश्रुति के अनुसार राव दूदा की अनुपस्थिति में मीरां पूजा भोग आदि करती थी। दो दिन तक भोजन पड़ा रहा तो तीसरे दिन भोजन रख कर मीरां ने भगवान को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि आज भोजन न किया तो आत्मघात कर लूगी। जब मीरां कटार से आत्मघात करने लगी तो मूर्ति ने मीरां का हाथ पकड़ लिया और भोजन किया। दूदा जी ने वापस आकर जब यह चमत्कार देखा तो मीरां के चरणों में सादर प्रणाम किया। इस चमत्कारिक घटना से 10 वर्षीय मीरां का यश चारों और फैल गया।

 वि.सं. 1580 में कुंवर भोजराज के देहान्त के बाद मीरां का वैवाहिक सुखी जीवन समाप्त हो गया। संवत 1584 में रतन सिंह की मृत्यु से मीरां को दूसरा आघात लगा। मीरां के मन में पली वैराग्य भावना उभर कर सामने आई और लोक लाज त्याग कर कृष्ण भक्ति में लग गई।

 
महाराणा सांगा व कुंवर रतनसिंह की मृत्यु के बाद विक्रमसिंह मेवाड़ के शासक बने। विक्रमादित्य चाहते थे कि मीरां वैभव का जीवन बिताए। देवर द्वारा सताने की अनेक जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। इन घटनाओं पर मीरां ने अनेक पदों की रचना की भी है।  

 मेवाड़ में बढ़ते कष्टों से मीरां ने मेवाड़ का परित्याग कर मेड़ता आ गई जहाँ वो भाई जयमल के साथ रहते हुए भक्ति और सन्तों की सेवा में जुट गई।

संवत 1595 में मेड़ता पर मालदेव के आक्रमण के बाद मीरां वृंदावन और द्वारका संवत 1600 में चली गई। राणा उदयसिंह द्वारा वापस आने का आग्रह और पुरोहितों द्वारा अन्न त्याग से मीरां संकट में पड़ गई। उसने ईश्वर से प्रार्थना की।

 
कहते हैं कि मीरां की आत्मा द्वारकेश्वर की प्रतिमा में विलीन हो गई और उसके का कुछ अब भी भक्त जनों को दिखता है। मीरां की पूजा प्रतिमाओं में से एक मेड़ता के चतुर्भुज जी के मन्दिर में, दूसरी नुरपुर के गिरिदुर्ग में तथा तीसरी उदयपुर के श्री मुरलीधर जी के विशाल देवालय में स्थापित हैं। अनुमान है आठ वर्ष तक द्वारिका में रहने के कारण वहाँ भी एक प्रतिमा होनी चाहिये। आज राजपूताना को भक्तिमति मीरां बाई के देश के नाम से भारत के लोग जानते हैं। मीरां की पूजा धामों में की जाती है। मीरां परम् धर्मात्मा, ईशभक्त,वेद-शास्त्र पारंगत, दयाशील, काव्य नाट्य, वाद्य,गायन में प्रवीण थी ।

राव जयमल

राव जयमल का जन्म 17 सिम्बर 1507 ई. को हुआ था। राव वीरमदेव की मृत्यु के पश्चात् फरवरी 1544 ई. में जयमल मेड़ता का शासक बना।

 
शेरशाह की मृत्यु के बाद मालदेव पुनः जोधपुर पर अधिकार करने में सफल हो गया। अब भी वह मेड़तिया राठौड़ों को सन्देह की दृष्टि से देखता था फिर भी सात वर्ष तक वह जयमल पर आक्रमण की कोई बात सोच न सका। जयमल ने अपने राज्य को सुदृढ़ बनाने व शक्ति बढ़ाने के लिए अपने विश्वस्त सरदारों को जागीरें प्रदान की। मालदेव ने इससे नाराज होकर मेड़ता पर चढ़ाई कर दी। जयमल ने संधि का प्रयास किया पर मालदेव ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। फलत: दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। मालदेव की सेना के पैर उखड़ गए और मालदेव रणक्षेत्र से भाग गया। इस युद्ध में मालदेव को बचाने में उनका वीर सेनापति नगा भारमलोत काम आया। दोनों सेनाओं के अनेकों योद्धा रणक्षेत्र में काम आए।
 

25 जनवरी 1557 ई. को राव मालदेव ने जयमल की अनुपस्थिति का लाभ उठा मेड़ता पर अधिकार कर लिया। जयमल की सेना हरमाड़ा युद्ध के बाद बिखर गई थी। अतः पुनः मेड़ता प्राप्ति का उसका प्रयास सफल नहीं हुआ। मालदेव ने आधा मेड़ता जयमल के भाई जगमाल को प्रदान किया।

राव जयमल शाही सहयोग की इच्छा से अकबर की सेवा में चला गया। बादशाह अकबर के आदेश से शरफुद्दीन ने सेना सहित मेड़ता पर चढ़ाई की। मालदेव ने चन्द्रसेन के नेतृत्व में सेना भेजी थी पर शत्रु पक्ष की शक्ति पहचान कर वापस जोधपुर लौट आया। जयमल का 1563 ई. में मेड़ता पर पुनः अधिकार हो गया।
 

सन् 1563 ई. में जयमल को बागी शरफुदीन को संरक्षण देने के कारण शाही सेना का कोपभाजक बनना पड़ा। वह मेड़ता त्याग कर मेवाड़ सपरिवार चला गया। महाराणा उदयसिंह ने जयमल को बदनोर, करहेड़ा और कोठारिया की जागीरें प्रदान की। शाही आदेशानुसार मेड़ता जगमाल को सौंप दिया गया।

महाराणा उदयसिंह ने जयमल की वीरता से प्रभावित हो 1565 ई. में चित्तौड़ का दुर्गाध्यक्ष नियुक्त कर दिया। महाराणा द्वारा अकबर की आधीनता स्वीकार करने से मना कर देने पर 1567 ई. में अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी।

चित्तौड़ दुर्ग के सरदारों में सन्नाटा व्याप्त था। लगातार चार माह तक युद्ध के कारण किले में रसद प्राय: समाप्ति को था। अत: जयमल के परामर्शानुसार जौहर का निर्णय लिया गया। जयमल व पता सिसोदिया की पत्नियों के नेतृत्व में स्त्रियों तथा बच्चों ने जौहर किया।

 

दूसरे दिन सूर्योदय के साथ ही राजपूत योद्धा केशरियाँ वस्त्र धारण कर दुर्ग के कपाट खोल मुगल सेना पर शेरों की तरह झपट पड़े। जयमल वीरवर कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठ कर युद्ध करते हुए हनुमान पोल और भैरव पोल के बीच दोनों योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। अकबर भी क्षत्रियों के आक्रमण को देख दंग रह गया। जयमल का बहनोई पता बहादुरी से लड़ता हुआ एक कुद्ध हाथी द्वारा मारा गया।

 
जयमल के अनुज ईशरदास मेड़तिया, प्रताप मेड़तिया व चाचा रायमल के पुत्र अर्जुन मेड़तिया, रायमल का पौत्र एवं सुरजन का पुत्र रूपसी मेड़तिया तथा करमचन्द मेड़तिया वीरगति को प्राप्त हुए। अनेकों शूरवीरों ने हँसते-हँसते मातृभूमि का आलिंगन किया। 25 जनवरी 1568 ई. को चितौड़ के तीसरे इतिहास प्रसिद्ध शाके का दारुण अन्त हुआ। मेड़तिया राठौड़ों का वह दैदीप्यमान उज्ज्वल दीप सदा के लिए बुझ गया।

 
जब तक राजपूतों के पास अपने पूर्वजों की सम्पति का कुछ भी अंश अथवा पुरातन घटनाओं की कुछ यादें शेष रहेंगी तब तक जयमल-पता के नाम बड़े सम्मान एवं गौरव के साथ स्मरण किए जायेंगे। अकबर ने जयमल-पता की वीरता से प्रभावित हो दोनों की गजारूड़ पाषाण मूर्तियों का निर्माण कर अपने किले के मुख्य द्वार पर प्रतिष्ठित कराई। बर्नियर ने लिखा है जयमल-पता ने स्वदेश की रक्षार्थ अपना तन-मन अर्पण कर दिया एवं एक आक्रमणकर्ता के अधीन हो जाने की अपेक्षा चितौड़ की स्वतन्त्रता के लिए शत्रुओं पर आक्रमण करके मर जाना ही अच्छा समझा।
 

जयमल के पुत्र

1. सुरताण-यह जयमल का ज्येष्ठ पुत्र था जिसे अकबर से मेड़ता प्राप्त हुआ। इसके वंशज  
   सुरताणोत मेड़तिया कहलाए।

2. केशवदास-इसे अकबर से आधा मेड़ता प्राप्त हुआ। इसके वंशज केशवदासीत मेड़तिया  
   कहलाए।

3. गोयंददास-इसे नीलिमा मिला था। यह केशवदास के साथ बीड़ के युद्ध में काम आया।  
   इसके पुत्र एवं सांवलदास के पुत्र रघुनाथ सिंह को मारोठ मिला था। इसके वंशज     
   रघुनाथसिंहोत मेड़तिया कहलाये।

4. माधवदास-इसे रीयां की जागीर मिली यह अजमेर के शाही सूबेदार से लड़ता हुआ काम  
   आया। इसके वंशज माधवदासीत मेड़तिया विख्यात हुए।
5. कल्याणदास-इसके वंशज कल्याणदासोत मेड़तिया कहलाए।
6. रामदास-हल्दीघाटी युद्ध में राणा प्रतापसिंह की ओर से लड़ता हुआ काम आया।
7. विट्ठलदास-इसने जगा जोड़चा को मारा था। इसके वंशज विट्ठलदासोत मेड़तिया कहलाए।
8. मुकुनदास-जयमल के बाद बदनौर की गद्दी पर बैठा। मुकुनदास की संतति मुकुनदासोत
     मेड़तिया कहलाए।
9. श्यामदास-दूदा हाडा की सेवा में रहते हुए बहलोल खाँ से लड़ता हुआ मारा गया।
10. नारायणदास-इसे सुरताण से लांबिया का पट्टा मिला। इसकी संतति नारायणदासोत
     मेड़तिया कहलाये।
11. नरसिंहदास के कोई संतान नहीं हुई।
12. द्वारकादास-इसे अकबर ने लांबिया का पट्टा दिया। यह बीड़ के युद्ध में केशवदास के
     साथ मारा गया।
13. हरीदास-यह राणा प्रतापसिंह की सेवा में रहा। इसे देलाणा की जागीर मिली। यह राणपुर
    के युद्ध में मारा गया।
14. सादूल-जयमल से कुड़की जागीर में मिली। यह शरफुद्दीन की रक्षार्थ नागौर में मारा
    गया। इसके वंशज सादूलोत मेड़तिया कहलाए।

सुरताण और केशवदास मेड़तिया शाही सेना के साथ रहकर, अनी बहादुरी व वफादारी - साबित कर चुके थे। अत: 1580 में सुरताण को अकबर से मेड़ता प्राप्त हो गया। राव रमदेव का पौत्र व ईशरदास का पुत्र नरहरदास सुरताण से नाराज था क्योंकि इसे इच्छानुसार जागीर प्राप्त नहीं हुई। वह केशवदास से मिल गया। नरहरदास के प्रयासों से केशवदास को आधा मेड़ता प्राप्त हुआ। केशवदास ने प्रसन्न होकर नरहरदास को रीयां की जागीर प्रदान की।  ..... आगे पढ़िये .....

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मेड़तिया राठौड़ ( भाग - 1 )

मालवा व राजस्थान के राठौड़ों के आदीराव सीहा के मृत्यु स्मारक लेख से यह प्रमाणित होता है कि 13 वीं शताब्दी के मध्य में मारवाड़ में राठौड़ों का आगमन हुआ था। मंडोर के तीसरे शासक जोधा के पुत्र दूदा के वंशज मेड़तिया कहलाए। साथ ही ये दूदावत भी बोले जाते हैं। रावदूदा की सन्ताने मेडता नामक स्थान की शासक होने के कारण मेड़तिया राठौड़ कहलाये

जितना विस्तार मेड़तियों का हुआ उतना अन्य राठौड़ शाखाओं का नहीं हुआ। मेड़ता के अलावा परबतसर, नांवा, मारौठ,जैतारण, कौलियां, नागौर तथा दौलतपुरा परगने की करीब 600 जागीरें मेड़तियों के अधिकार में थी। राठौड़ों की उच्च शाखा मेड़तियों के विवाह सम्बन्ध सिसोदिया राजघराने में होने के कारण मेवाड़ के लिए मेड़तिया शूरवीरों ने अनेकों बार आत्मोसर्ग किया ।

राव दूदा

जोधपुर के संस्थापक जोधा के पुत्र दूदा का जन्म रानी सोनगरी चाँपा की कोख से 15 जून सन् 1440 ई. को हुआ। दूदा का बाल्यकाल संकटों में व्यतीत हुआ वह बचपन से ही चंचल एवं तेज स्वभाव के थे। दूदा की शिक्षा की अच्छी व्यवस्था की गई थी। विपत्तियों ने उनमें अनेक गुणों का विकास किया और कुछ ही समय में दूदा युद्ध विद्या में प्रवीण हो गए। जैतारण के स्वामी मेघासींधल के पिता द्वारा आसकरण शक्तावत (राठौड़) के वध का बदला लेने के लिए राव जोधा ने दूदा को भेजा। दूदा व मेघा सीधल के बीच एकाकी युद्ध हुआ। इसमें दूदा ने मेघा का सिर धड़ से अलग कर अपने रण चातुर्य की परीक्षा दी।

जोधपुर से 117 किमी. उत्तर-पूर्व में स्थित मेड़ता नगर को वरसिंह व दूदा ने आबाद किया। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि मानधाता राजा ने उस नगर की स्थापना की थी। इसका प्राचीन नाम मेड़तपुर व मेड़न्तक था। 1318 ई. के बाद मेड़ता नगर उजड़ गया तथा वीरान पड़ा रहा जिसे वरसिंह व दूदा ने आबाद किया।

चैत शुक्ला 6 विक्रम सम्वत 1518 को कोट की आधारशिला रखी। वरसिंह औरदूदा ने उदा राठौड़ को अपना प्रधान नियुक्त किया। वरसिंह दूदा ने सांखलों से चौकड़ी, कोसाणां और मादलिया जीत कर अपने राज्य की वृद्धि की। इसके बाद दूदा अपने भाई राव बीका के पास बीकानेर चले गए जहाँ काफी समय तक रहे। बीकानेर के मार्ग में दूदा की भेंट सिद्ध पुरुष जाम्भोजी से हुई जिसने मेड़ता प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

हिसार के सूबेदार सारंगखाँ द्वारा राव बीका के चाचा कांधल को मार डाला गया। अतः राव जोधा, राव बीका और दूदा ने सारंगखाँ पर आक्रमण किया। सारंगखाँ युद्ध में मारा गया और उसकी सेना परास्त हुई। इस युद्ध में दूदा जी ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया था।

वरसिंह ने 1490 ई. में सांभर पर आक्रमण कर लूटा। सांभर के हाकिम मल्लू खां ने इसका बदला लेने का निश्चय किया और उपयुक्त समय पर मल्लू खां ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया। वरसिंह मेड़ता छोड़कर जोधपुर चला गया। मेड़ता को मल्लू खां ने लूटा और उसके सैनिकों ने गौरीपूजा के लिए जाती महिलाओं का अपहरण कर लिया। राठौड़ दूदा को जब इस घटना का पता लगा तो वह सेना सहित जोधपुर पहुँचे जहाँ से सातल, सूजा और वरसिंह और दूदा ससैन्य बीसलपुर पहुँचे। युद्ध कला के अनुभवी वरजांग भींवोत राठौड़ को अपने साथ मिला कर रात्रि के समय शत्रु सेना पर अचानक हमला कर दिया। मल्लू खाँ पराजित हुआ और मीर घुड़ला मारा गया। दूदा जी के पराक्रम व रण कौशल की इससे बड़ी ख्याति हुई। दूदा ने शत्रु सेना को चीरते हुए सारंग खां का पीछा कर उसका हाथी छीन लिया था।

मल्लू खां ने माण्डूके बादशाह से सैनिक सहायता प्राप्त कर कोसाणा की हार का बदला लेने के लिए मेड़ता पर आक्रमण कर दिया। वरसिंह जब समझोते के लिए अजमेर गया तो धोखे से मल्लू खां ने उसे बन्दी बना लिया। इसकी सूचना मिलते ही राव बीका और जोधपुर के राव सूजा की संयुक्त सेना ने चढ़ाई की जिसकी सूचना मिलते ही मल्लू खां ने सुलह कर वरसिंह को रिहा कर दिया। मल्लू खां ने अजमेर में वरसिंह को जहर दे दिया था। फलतः छ: माह बाद उसका देहान्त हो गया। वरसिंह का बड़ा लड़का सींहा मेड़ता का शासक बना जो अयोग्य एवं विलासी था। सींहा की मां ने दूदा को बीकानेर से बुला कर मेड़ता का शासन प्रबन्ध उन्हें सौंप दिया और आधी आय सींहा को देने का फैसला किया गया। इस प्रकार मेड़ता बचा लिया गया ।
 

दूदा ने सींहा की हरकतों को दो वर्ष तक देखा और सुधार न देखकर उसे रांहण भेज दिया और जागीर का पट्टा दे दिया। अब राव दूदा (सन् 1495 में) सारे मेड़ता का स्वामी बन गया। राव दूदा की मृत्यु की निश्चित तिथि तो प्राप्त नहीं हो सकी पर उसकी मृत्यु करीब 75 वर्ष की आयु में हुई।

 राव दूदा के पांच पुत्र थे। वीरमदेव मेड़ता का शासक बना। रायमल को रायण की जागीर प्राप्त हुई और उसके वंशज रायमलोत मेड़तिया कहलाए। तीसरा रायसल के वंशज रायसलोत मेड़तिया कहलाए। चौथा रतनसिंह को कुड़की का ठिकाना मिला। वह खानवा के युद्ध में रायमल के साथ वीरगति को प्राप्त हुआ। इसकी पुत्री भक्तिमती मीरां बाई राणा सांगा के पुत्र भोजराज से ब्याही गई। पांचवां पुत्र पंचायण जोधपुर के राव मालदेव की सेवा में रहा। पंचायण शरफुद्दीन की मेड़ता की चढ़ाई के समय अपने पुत्र जैतमल के साथ 1563 ई. में काम आया


राव दूदा मारवाड़ का एक महत्वपूर्ण सफल व्यक्ति था जो अपने साहस व दृढ़ संकल्प के कारण अपने समय का एक दुर्धष योद्धा माना गया।

राव वीरमदेव

दूदा का जयेष्ठ पुत्र राव वीरमदेव 1515 ई. में मेड़ता की गद्दी पर बैठा। वीरमदेव का जन्म 19 नवम्बर 1477 को हुआ। वीरमदेव निर्भीक एवं रणकुशल शासक था जिसका सम्बन्ध जोधपुर के राव मालदेव से कभी अच्छा नहीं रहा।

मेड़ता का पूर्व शासक सीहा रायण ग्राम में ही रहा किन्तु उसके पुत्र जैसा, गांगा तथा भोजा पराक्रमी थे अंतराल में मेड़ता प्राप्ति के प्रयास करने लगे। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वे मालदेव से मिले जिसने उनको वीरमदेव पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। मालदेव अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध सैनिक सहायता न दे सका। सीहा के पुत्रों ने मेड़ता पर आक्रमण कर मेड़ता में लूटपाट की किन्तु वीरमदेव ने जब चढ़ाई की तो तीनों भाई-भाई गए और बुरी तरह जख्मी हुए, वीरमदेव विजयी हुआ। ईडर के शासक रायमल राठौड़ को गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने ईडर से निकाल दिया था और मुवारिजुलमुल्क को हाकिम नियुक्त कर दिया। रायमल राठौड़ मेवाड़ के राणा सांगा के पास गया और सहायता की मांग की। राणा सांगा ने जोधपुर के राव गांगा व मेड़ता के राव वीरमदेव की संयुक्त सेनाओं के साथ ईडर पर चढ़ाई की । मुवारिजुलमुल्क ईडर से भाग अहमदाबाद चला। ईडर पर अधिकार के बाद राणा सांगा अहमदनगर पर अधिकार कर वापस लौट आए।

 
17 मार्च सन् 1527 ई. को राणा सांगा और बाबर के बीच खानवा के युद्ध में मेड़ता के राव वीरमदेव का नाम विशेष उल्लेखनीय है। वीरमदेव के साथ उसके भाई रायमल तथा रतनसिंह सहित 5000 सैनिकों ने इस युद्ध में भाग लिया। राणा सांगा युद्ध में अचेतन हो गए थे तथा वीरमदेव उस युद्ध में घायल हो गए थे। रायमल तथा रतनसिंह मुगल सेना का संहार करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इसी रतनसिंह की एक मात्र सन्तान मीरांबाई थी।


वीरमदेव ने दो बार राणा सांगा के पक्ष में युद्ध में भाग लिया। राव वीरमदेव की

तत्कालीन स्वतन्त्र शासकों में शक्तिशाली शासक के रूप में गणना की जाती थी। यही नहीं वीरमदेव ने अपने भाई बन्धुओं व मित्रों एवं संगों को भी समय-समय पर सैनिक सहायता प्रदान की थी।

 
जोधपुर के राव गांगा की मृत्यु के बाद मालदेव गद्दी पर बैठा। उसने मेड़तिया राठौड़ों को समूल नष्ट करने का निश्चय कर लिया था। किन्तु उसके उमराव जैता एवं कुंपा स्वजातीय बन्धुओं से लड़ने के पक्ष में नहीं थे। कुंपा का वीरमदेव से मनमुटाव हो गया था किन्तु उसके मन में वीरमदेव के प्रति सम्मान में कमी नहीं आई थी।

गुजरात के बादशाह के सेनापति शमशेरुलमुल्क को वीरमदेव के हाथों पराजित होकर भागना पड़ा। यह युद्ध आलनियावास में हुआ था। वीरमदेव ने बिना विलम्ब ई. 1535 में अजमेर पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। राव मालदेव ने पाटवी के नाते अजमेर की मांग की किन्तु वीरमदेव ने मना कर दिया। इस पर मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया। वीरमदेव अपने सरदारों के कहने पर अजमेर चला गया और मेड़ता पर 1536 ई. में मालदेव का अधिकार हो गया इसके बाद मालदेव ने अजमेर भी छीन लिया और वीरमदेव डीडवाना चला गया।

 
मालदेव की सेना के पीछा करने पर वीरमदेव नाण अमरसर शेखावाटी पहुंचे जहाँ राव रायमल शेखावत के पास साल भर रहे। इसके बाद ई. 1537 में चाटसू पर अधिकार कर लिया वहां से मालदेव की सेना द्वारा पीछा करने पर वीरमदेव क्रमश: लालसोट व बंवाली मौजाबाद चले गए। जैता और कुंपा बिना युद्ध किए ही बंबाली से वापस जोधपुर लौट आए। वीरमदेव मेड़ता पर पुनः अधिकार करना चाहता था। मालदेव ने बीकानेर के राव जैतसिंह को भी खत्म कर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल सिरसा में रहन लगा। उसका मन्त्री नगराज शेरशाह सूरी की सेवा में गया। दूसरी ओर वीरमदेव भी रणथम्भौर के नवाब की मदद से शेरशाह के पास पहुंचा दोनों ने मालदेव पर चढ़ाई करने के लिए शेरशाह को तैयार कर लिया।

 
शेरशाह अपनी विशाल सेना सज्जित कर राव मालदेव पर चढ़ आया। राव वीरमदेव और राव कल्याणमल भी उसके साथ थे। यह सूचना मिलने पर मालदेव भी अपने प्रसिद्ध सेना नायक जैता, कूंपा, अखैराज सोनगिरा, जैसा चांपावत सहित सामने आ डटा। किन्तु दोनों ही पक्ष युद्ध की भयावहता से भयभीत हो एक माह तक आमने-सामने पड़ाव डाले पडे रहे। तब वीरमदेव ने छल की नीति अपनायी और मालदेव के सरदारों को सस्ती कीमत में ढ़ालें बिकवाने की योजना बनाई और उनकी गद्दियों में जालीपत्र व मोहरें भरवा दी।

 
इसकी जानकारी मालदेव तक पहुंचा दी गई कि आपके सरदारों को बादशाह ने अशर्फियों से खरीद लिया है। मालेदव ने जांच की तो अपने सरदारों पर सन्देह हो गया। वीरमदेव की इस कार्यवाही का किसी भी सरदार को पता नहीं चला। विस्वस्त सरदारों को बिना बताए ही मालदेव एक रात्रि को अन्धेरे में रणक्षेत्र से वापस लौट गया।

मालदेव के साथ अधिकांश सेना चली गई थी मात्र 10 हजार सैनिक व जैता-कूपा बचे थे। सुमेल के इस ऐतिहासिक युद्ध में वीरवर जैता,कूंपा, अखैराज सोनगरा आदि अन्तिम समय तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हए। इस युद्ध में राजपूत सेना की बहादुरी व आक्रमण क्षमता को देख शेरशाह के मुंह से स्वयं ही ये शब्द निकले 'एक मुट्ठी बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाही खो देता'। इस लोमहर्षक युद्ध के बाद वीरमदेव को मेड़ता पुनः प्राप्त हुआ।

 
इस प्रकार छ: वर्ष के संघर्ष के बाद मेड़ता पर वीरमदेव का अधिकार हुआ। मेड़ता के आस-पास के सभी ठिकानों पर मेड़तिया राठौड़ों ने पुनः अधिकार कर लिया। मेड़ता व बीकानेर के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो गए किन्तु मालदेव व मेड़तिया राठौड़ों के बीच पड़ी दरार ने भविष्य मे बड़ा रूप ले लिया। राठौड़ शक्ति दो भागों में विभक्त हो गई। एक ओर जोधपुर के शासक व उसके सामन्त तो दूसरी ओर मेड़ता व बीकानेर जिसका लाभ शत्रु को मिलना स्वाभाविक ही था।

 
राव वीरमदेव का देहान्त 66 वर्ष की आयु में फरवरी सन् 1544 में हो गया। वीरमदेव के 10 पुत्रों का विवरण प्राप्त है। जयमल यह वीरमदेव का ज्येष्ठ पुत्र था जो मेड़ता की गद्दी पर बैठा। दूसरा ईशरदास जिसके वंशज ईशरदासोत कहलाए। उन्हें आलणियावास का ठिकाना प्राप्त हुआ। जगमाल यह राव मालदेव की सेवा में रहे। इनके वंशज जगमालोत मेड़तिया कहलाए। सन् 1557 में मालदेव ने मेड़ात विजय कर आधा मेड़ता जगमाल को प्रदान किया। 1563 ई. में जगमाल पूरे मेड़ता का शासक नियुक्त किया गया था।

 
चाँदा ने बलूदा ग्राम बसाया वह स्वतन्त्र प्रकृति का वीर पुरुष था। जिसके वंशज चाँदावत मेडतिया कहलाए। बीका, इसके पुत्रों को सोजत व जैतारण में जागीर मिली। पृथ्वीराज के वंशज मेवाड़ में रहे। प्रतापसिंह को मेवाड़ में जनोद की जागीर मिली इसी के पुत्र गोपालदास को घाणेराव का ठिकाना प्राप्त हुआ। इसके वंशज गोपीनाथ से गोपीनाथोत शाखा चली। सारंगदेव इसे वणहड़ा में सोलंकी राजपूतों ने मार डाला था। मांडण, यह भी सारंगदेव के साथ मारा गया ।  ( आगे पढ़िये......)

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लेखक - देवी सिंह मंडावा

शादी-विवाह और मैरिज ।

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