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Friday, 8 February 2019

रिश्ता


हृदय  की
अगाध गहराइयों में,
पल्लवित है
एक बेनाम-सा
रिश्ता,  
जो अक्सर बगावती
तेवर दिखा ,
चाहता है कोई
नाम अपने लिए,
अब तुम ही कहो,
कहाँ संभव है इस
संवेगहीन दुनियाँ
में किसी को
अपना कहना....
"विक्रम"

Sunday, 3 February 2019

पुनर्जन्म


मैं,
तैरकर ना आ सका
हमारे दरमियाँ बहते
रिवाजों ,ऊंच-नीच
की लहरों ,समाज के
बंधनो के भँवर के उस पार....
मगर ,
मैंने तुम्हारी यादों की
एक नाव बना रखी है,
तुम बस  उस  पार
इंतजार की पतवार
थाम के रखना ,
इस जन्म का लंगर
खोल,  फिर लेंगे  
पुनर्जन्म .....



Wednesday, 15 August 2018

रिश्तों का आरक्षण


मकानो के मालिक
ओर उनके
किराएदार ,
कुछ उसी तरह
सिर्फ मालिक भर हूँ,
में अपने इस दिल का ,
बिना किराए के   
किरायेदार
बसते हैं इसमें,रिश्तों का
आरक्षण लेकर,
कुछ मियादी
तो कुछ
बेमियादी रिश्तों
की लीज़ लिए
बैठे हैं......
-विक्रम




Monday, 11 June 2018

कोई पुराना रिश्ता


अतीत के आले में
एक बेनाम-सा रिश्ता 
छुपाकर अपनों से
सहेज के रखा है वर्षों से...
मैं ताउम्र उसके लिए 
तलाशता रहा एक 
उपयुक्त सा सम्बोधन
ताकि पुकार सकूँ उसे...
मगर चाहकर भी,
आवंटित ना कर सका 
कोई सार्थक सा नाम,
और बस बैठाता रहा 
तारतम्य नामांकित 
और बेनाम-से 
रिश्तों के 
दरमियाँ 
उम्रभर..!

"विक्रम"


Sunday, 7 January 2018

अनुबंधित यादें

मुंडेर  के दोनों ओर
 धूप में फैला दिया है
तुम्हारी अचैतन्य ओर   
सीलनभरी यादों को  ,
ज़हन मे क्रमबद्ध
अभिलिखित है वो  
सिलसिले,जो
आतुर है पुनरारंभ को ।
मासूम से बच्चे की मानिंद
हुलस कर, आ लगती हैं  
गले,कुछ उनींदी यादें ।  
जन्म-जन्मांतर तक
अनुबंधित है
तुम्हारी

यादें.....

"विक्रम"

Saturday, 14 October 2017

दर-ब-दर

बालिश्त दर बालिश्त
गुजरती उम्र,
गिनती रही पोरों
पे वो पड़ाव ,जो
बदलते रहे मायने
ज़िंदगी के ,
यादों की पुनरावृतियां
लाती रही सुनामीयां, 
बस यूँ कटता रहा
उबाऊ सफर
अनिश्चितताओं
के संग
दर-ब-दर..... बदस्तूर....

"विक्रम"

Sunday, 8 October 2017

अतीत

वक़्त के घोड़े पे सवार,
अतीत को पहलू में दबा , 
भागता रहा वो ताउम्र, 
मगर....
यादों के नुकीले तीर,
भेदते रहे,उसके
जिस्म-ओ-जान को,
और नोचते रहे ,
ज़हन से चिपके
अतीत के उस
हर एक लम्हे को….
-ak
 
 
 
 

Friday, 6 October 2017

यादों की जुंबिश

 

सुषुप्त शरीर में,
सिहरन-सी 
भर देती हैं 
यादों की एक 
हल्की-सी जुंबिश,
मगर....
बाद इसके
अंदर से कुछ 
यूँ टुकड़ों में 
बिखर जाता है,
बाद तूफान के
बिखरता है कोई 
आशियाना जैसे.....

 
"विक्रम"


Wednesday, 21 June 2017

तक़सीम


वो बेनाम से रिश्तों के धागे
पूरी तरह से टूटे नहीं है,
अभी भी उलझे हैं 
मुझ में उनके कुछ तार,
मगर....,
वक़्त के पहिये
मे फँसकर,
अनवरत टूटते बंधनों को
सहेजने मे ,
मैं खुद टूट चुका हूँ ।
अपेक्षित है संचयन
उन धागों का तुमसे भी ,
तकसीम में ,
जिनके कुछ सिरे,
थे तुमसे भी लिपटे हुये ....

"विक्रम"

Saturday, 17 June 2017

घर

भागते-दौड़ते....
अल सुबह भोर में ही,
लोगों के झुंड के झुंड ,
निकल पड़ते हैं सड़कों पे ,
और शाम के धुंधलके
से लेकर, देर रात तक,
लौटते रहते हैं उन घरों में,
जिनको,
बनाना तो आसान था
मगर ,

चलाना दुष्कर है.....

"विक्रम"

Friday, 28 October 2016

यादों का मकान

भूले बिसरे, जीर्ण लम्हों पर,
यादों की एक खंडित छत ,
बूढ़ी दीवारों से लिपटी ,
वादों के पैबंद लगी
खस्ताहाल कुछ शामें....
सीलनभरे  और अलसाए
मौसमों के टुकड़े, जो
बिखरे पड़े हैं....दूर तक
उन पुराने रास्तों पर....
गुजरा था वक़्त का एक सैलाब ,
जिन रास्तों पर .....।
वो उदास दोपहरी ,
अक्सर दीवार के टूटे हिस्सों से ,
भीतर झांककर चली जाती है ।
और रातों मे स्याह अंधेरे
चले आते हैं, सराय समझकर….
उनमें से कुछ....
बुझे हुये से,
पड़े रहते हैं कोनों मे दिनभर.....

  
"विक्रम"

Friday, 22 July 2016

ज़ख्म




पाल रखें हैं कुछ ज़ख्म मैंने ,
होता है रूहानी एहसाह कुरेदने पर जिनके ।
कभी दरमियाँ मायूसियों के जब-- मैं उनकी कुछ, 
परतें हटा देता हूँ तो ,
रिसने लगता है लहू ,आंसुओं की माफिक..
सोचता हूँ कभी , उतरकर इनमें, 
इनकी गहराई नापूँ !
 
"विक्रम"
 

Tuesday, 19 July 2016

हाइकु


( पहली बार "हाइकु" लिखने की कोशिश  )

वोट मांगते
खींसे निपोरकर
निर्लज नेता

 
हवाई किले 
पंचवर्षीय नीति
खट्टे अंगूर

 
भूखी जनता
सरकारी अमला
ऐशों-आराम

 
सुरसा मुँह
गरीबी उन्मूलन
असाध्य रोग

 
विक्रम”


 

 

 

 

 

 

 

 

 

शादी-विवाह और मैरिज ।

आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...