Friday, 22 July 2016

ज़ख्म




पाल रखें हैं कुछ ज़ख्म मैंने ,
होता है रूहानी एहसाह कुरेदने पर जिनके ।
कभी दरमियाँ मायूसियों के जब-- मैं उनकी कुछ, 
परतें हटा देता हूँ तो ,
रिसने लगता है लहू ,आंसुओं की माफिक..
सोचता हूँ कभी , उतरकर इनमें, 
इनकी गहराई नापूँ !
 
"विक्रम"
 

Tuesday, 19 July 2016

हाइकु


( पहली बार "हाइकु" लिखने की कोशिश  )

वोट मांगते
खींसे निपोरकर
निर्लज नेता

 
हवाई किले 
पंचवर्षीय नीति
खट्टे अंगूर

 
भूखी जनता
सरकारी अमला
ऐशों-आराम

 
सुरसा मुँह
गरीबी उन्मूलन
असाध्य रोग

 
विक्रम”


 

 

 

 

 

 

 

 

 

Saturday, 25 June 2016

कुछ पंजाबी

बेजाँ बेदर्दा इस दिल विचों तेरी हर एक याद भुला देणी
मे अपणे सब अरमाना ननुं आज आ'पे ही तीली ला देणी...

मेरे अथरू, मेरीया अंखा तेनु की
कित्थे लावां, कित्थे रख्खा तेनु की
 ( अर्थ- मेरे आँसू , मेरी आँखें ,तुम्हें क्या कहाँ लाऊं कहा रखूँ , तुम्हें क्या )

मेँ हाल वेख ल्ये हीरा दे
सब धोखे ने तकदीराँ दे
तू जद पुछ्दा प्याराँ लै
दिल हामी भरदा ऐ
तेनु प्यार ता करदी आ
वे दिल टूटणु डरदा ऐ ...

"सानु हंसके हसाण वाळे टूर गए हूण हंसिया नी जाँदा
टूटी ज़िंदगी ते चरखे दी माल वे तंद्द कतिया नी जाँदा...."
 
थोड़ा वक़्त लगु पर भूल ज्यांगे जवें तूँ सानु भूल गई
हाल चाल ता ठीक जैया पर पैला वरगा नहीं...

तूँ भुल्ल जावण दी गल करदी, भुल जाणा केड़ा सौखा हे....
बिछड़ के जीणा नि झलिए, सौ बार मरण तों औखा हे....
सानु पता असा ने डूब जाणा, चल फेर वी तरके वैखांगे
तेन्नु दिलों भुलाया नहीं जाणा, चल कोशिश करके वैखांगे

( हमे पता है की हम डूब जाएंगे, मगर चल फेर भी तैर के देखेंगे,
तुम्हें दिल से भुलाया नहीं जा सकता , मगर चलो फिर कोशिश करके देखेंगे)

बैठया सूतया याद कोई तड़फौन्दी रहंदी ए...
इक कुड़ी मेनू अजे वी चेते ओंदी रहंदी ए...

लंघदे हां जदों हूण शहर विचों तेरे,
बीती हुई जिंदगी पुराणी चेते आ जांदी"

 

 

 

 

 

Sunday, 19 June 2016

अव्यक्त शब्द


मैं, उम्रभर
तुम्हारे उन अव्यक्त
और अस्पष्टाक्षर शब्दों
के अर्थ तलाशने को ,
शब्द-मीमांसाओं के अंतर-जाल
भेदता रहा .....
कपोल-कल्पनाओं की
आड़ लेकर तलाशता रहा
कुछ समानार्थी शब्द !
शब्दों के उन झंझावातों ने
मतांध बना दिया मुझे ।
उल्लासोन्माद की पराकाष्ठाएं
लांघकर ,
जानना चाहता हूँ अभिप्राय,
तुम्हारे उन
अव्यक्त शब्दों का ....


"विक्रम"
 

Sunday, 17 April 2016

ख़ानदान

विजय ! तुम आज से हमारे घर ही रहना ,शादी वाला घर है इसलिए बहुत काम है । , अंकुर ने कहा।
ठीक है यार, मैं आज दोपहर बाद से वहीं आ जाता  हूँ ।
हाँ,बेटा ये आ जाएगा।, घर मे बैठा बैठा वैसे भी उकता रहा है”,विजय की माँ ने अंकुर से कहा।
आंटी , अब तो विजय की भी शादी कर ही दो “, अंकुर ने हँसते हुये कहा।
हाँ बेटे, जल्द ही कोई लड़की देखती हूँइसके लिए, विजय की माँ ने हँसते हुये कहा।

दो दिन बाद अंकुर की बहन की शादी थी। विजय और अंकुर बचपन के दोस्त थे। पढ़ाई पूरी होने के साथ ही विजय को पिछले साल नौकरी मिल गई थी और अंकुर ने गाँव मे ही अपना एक बिजनेस शुरू कर दिया था। विजय इन दिनों अंकुर की बहन की शादी के लिए छुट्टी आया हुआ था ।

 दोपहर बाद विजय अंकुर के घर चला आया,दोनों के घर आमने सामने ही थे। अंकुर के परिवार के सभी सदस्य विजय को काफी दिनों बाद आया देखकर काफी खुश हुये। विजय दिनभर काम मे हाथ बँटाता रहा। वो घर के अंदर से रसोई का सामान लाकर बाहर हलवाई को सौंप रहा था और तैयार सामान को घर के अंदर तक पहुंचा रहा था। रसोई की देखरेख की ज़िम्मेदारी अंकुर के बड़े भाई मनोज की साली अंजना की थी जो शादी मे आई हुई थी। अंजना बला की खूबसूरत मगर घरेलू टाइप की लड़की थी। इतनी सी उम्र मे वो काफी समझदार हो गई थी।

 रसोई का सामान एक दूसरे के हाथों से लेने देने मे कई बार जल्दबाज़ी में विजय और अंजना के हाथ एक दूसरे से टकराते तो वो एक दूसरे की तरह देखने लगते । शाम होते होते एक दूसरे की तरह देखने का सिलसिला और बढ़ता गया और अब हाथ जान-बूझकर टकराने लगे थे। विजय किसी ना किसी बहाने अंजना को देखने अंदर आता। अंजना की नजरे भी विजय को ही तलाशती रहती थी।  हालांकि ,शादी की गहमा-गहमी मे दोनों को एक दूसरे से बातें करने का कम ही समय मिला मगर दोनों ने इतने से वक़्त मे ही बहुत सारे सपने लिए थे।

  शादी के बाद विजय ने माँ को अंजना के बारे मे बताया और उस से शादी करने की इच्छा जाहीर की ।

ये कैसे हो सकता है ?”, विजय की माँ ने माथे पे सलवटें डालते हुये कहा।
क्यों माँ?”

बेटे उनका खानदान हमारे बराबर नहीं है ,हम लोग ऊंचे नदान से ताल्लुक रखते है ,हम छोटे ख़ानदानों में रिश्ते नहीं करते। तुम्हारे पिताजी को  पता चला तो और भी गुस्सा होंगे। ऐसा हरगिज नहीं हो सकता। रिश्तेदारी मे हमारी बड़ी थू थू होगी।

 विजय के देखे हुये ख़्वाब पलभर मे ही टूट कर बिखर गए थे।  वो अगले दिन अपनी ड्यूटी के लिए निकल चुका था । जाते वक़्त उसने अंकुर के घर की तरफ देखा ,अंजना बाहर ही खड़ी उसे देख रही थी । वो बुझे मन से शहर की तरफ चल पड़ा। अंजना की नजरे देर तक उसका पीछा करती रही।  

 वक़्त गुजरता रहा। 2 साल तक विजय घर नहीं आया। अचानक माँ तबीयत खराब होने की खबर सुनकर वो घर आ गया। कुछ दिनों बाद माँ की तबीयत मे कुछ सुधार हुआ तो उसकी माँ ने कहा,”बेटे मेरी अब तबीयत खराब होने लगी है तूँ शादी करले ताकि घर मे बहू आ जाए और वो घर का काम संभाल ले ताकि मुझे बुढ़ापे मे कुछ आराम मिले।

माँ और पिताजी के लगातार दवाब के चलते विजय ने बुझे मन से हाँ कर दी।

विजय की शादी हो गई।

शादी के बाद  दुल्हन और दुल्हन के परिवार वालों ने कह दिया की वो गाँव मे नहीं रहेगी ,विजय के साथ शहर में ही ही रहेगी।
 
बेटे , अपने साथ ही ले जा कुछ दिन के लिए , बाद मे हमारे साथ रह लेगी बहू। “, विजय के पिताजी ने कहा।

उसकी बूढ़ी माँ की आँखों से आँसू लुढ़ककर चेहरे की झुर्रियों मे जज़्ब हो गए।

 
पाँच साल गुजर गए। विजय पत्नी के साथ शहर मे रहने लगा था।  उसकी  पत्नी ने गाँव जाने से साफ साफ मना कर दिया था। हालांकि विजय गाँव आता जाता रहता था। पत्रों के जरिये माँ बाप की खैरियत के समाचार मिलते रहते थे। अंकुर की शादी का कार्ड मिला मगर ऑफिस मे जरूरी काम के चलते गाँव नहीं जा सका।

 देखते देखते और 2 साल गुजर गए। विजय इस दौरान गाँव नहीं जा सका। आज खत मिला की  माँ की  फिर से तबीयत खराब रहने लगी है । उसने ऑफिस में छुट्टी के लिए बोल दिया और सुबह की गाड़ी से अकेला ही गाँव के लिए निकल गया।

गाँव पहुँचकर चारपाई पर लेटी अपनी माँ के पास जा बैठा। माँ का हालचाल पूछने लगा।  

बहू नहीं आई बेटे ? “,विजय की माँ ने गर्दन घूमकर पूछा ।
विजय ने ना मे गर्दन हिला दी।
“कोई बात नहीं बेटे, उसका गाँव मे दिल नहीं लगता होगा
तभी एक महिला ट्रे मे चाय और कुछ नमकीन बिस्कुट लेकर आ गई।
विजय की माँ ने कहा , “चाय ले लो बेटे। “

“बेटे ये अंकुर की बीवी है ,तूँ तो उसकी शादी मे आ नहीं पाया था। ये बेचारी रोज रोज  काम मे हाथ बंटाने आ जाती है । बहुत सुशील और शालिन बहू हैं। अपने सास ससुर का बहुत ख्याल रखती है।  मेरा भी बहुत ख्याल रखती है ।“

विजय ने  ट्रे से चाय का कप उठाते हुये गर्दन उठाकर चाय लाने वाली महिला को देखा तो चौंक पड़ा।

“अंजना  !”

 

-विक्रम

 

  

     

 

 

 

 

 

 

 

 

  

 

 

 

 

Saturday, 27 February 2016

पुरानी यादें


हमारे गाँव के बहुत से  परिवार खेतों मे जाकर बस गए जिसकी वजह से गाँव उजड़ा उजड़ा सा नज़र आता है । हमारे घर के पास (चित्र में) ये मामराज लंबोरिया (चौधरी) का घर है । मामराज और गंगाराम दोनों भाई थे जिसमे मामराज बड़ा और शादीशुदा था जबकि गंगाराम ने  शादी नहीं की थी,या नहीं हुई थी पता नहीं । गंगाराम मे एक खास बात थी की वो रोजाना शराब पिते था मगर किसी को पता तक नहीं चलता था । गाँव मे किसी के घर से कच्ची शराब पीकर अपने घर आता और अपनी बिछी हुई चारपाई पट बैठ जाता , मामराज के बेटे बिना कहे ही उसे वहीं खाना दे देते। गंगाराम आराम से खाना खाते और तान के सो जाते। मैंने कभी उन दोनों भाइयों को लड़ते नहीं देखा। गंगाराम हालांकि मामराज के लड़कों को धमका देते थे,मगर कभी किसी ने पलट कर जवाब नहीं दिया। आज तो पैदा होते ही बच्चे माप-बाप को जवाब दे देते हैं।

बचपन मे हम लोग इनके अहाते मे और घर के सामने बने चौक मे देर रात तक खेलते थे। हम जब ज्यादा हल्ला मचाते तो गंगाराम एक आवाज लगाते और हम सब बच्चे डर कर दूर भाग जाते, बाद मे जब गंगाराम सो जाते तो हम फिर से खेलने लगते। आज तो अगर कोई किसी के बच्चों को कुछ कह दे तो लोग मरने मारने पर आमादा हो जाते हैं । आजकल ये चौक सुनसान पड़ा रहता है और यहाँ एक बच्चा भी खेलता नज़र नहीं आता।

मामराज को सिर्फ एक शौक था , हुक्का पीने का । चौबीस घंटे हुक्के का पाइप हाथ में रहता था। उसके बेटे हुक्का ठंडा होने पर उसे फिर से भर देते और मामराज फिर से उसे गुड़गुड़ाने लगते । हम लोग जब थोड़े बड़े हुये तो हम भी कभी कभी मामराज के हुक्के को खींचने पहुँच जाते, हालांकि मामराज के हाथ से हुक्का बहुत कम छूटता था ।  

इस परिवार के मुखिया यानि मामराज की पत्नी जिसे पूरागाँव "पारो" कहता था । कहते हैं उसका असली नाम कुछ और था मगर वो "पार" गाँव की थी इसलिए पारो कहने लगे। गाँव मे किसी को अगर सिर-दर्द भी हुआ और पारो को पता चला तो वो उसके घर जाकर उसके हाल चल पूछने लगती, भले ही उसका घर गाँव के दूसरे छोर पर हो।  आज के दौर मे ऐसी इंसानियत देखने को नहीं मिलती। गाँव के हर व्यक्ति के दु:ख दर्द को पारो ने अपना दुख दर्द समझा ,कोई भी बीमार होता तो वो उसके घर के रोज चक्कर लगाकर हाल चाल पूछने चली जाती। वो गुगलवा गाँव की "मदर टेरेसा" थी। मगर जब वो खुद मरणासन्न हुई तो कोई हाल पूछने भी नहीं आया। 

मामराज और गंगाराम भी उसी दौर मे चल बसे । मामराज के पुत्र और पौत्र अपने खेतों के जाकर बस गए। अब उनके पीछे ये खंडहर हो चुका मकान जो आज तक अपने अंदर हमारे बचपन को समेटे हुये है।
“विक्रम”


Sunday, 24 January 2016

अनदेखा



वर्षों बाद अपने उस शहर मे,
सब अंजाने लोग मिले ,
तुम्हारे घर की दीवार से
पीठ टिकाये ,सिर झुकाये
कुछ पुराने दिन बैठे थे।
नहीं देखा मेरी तरफ ,
एक पल को भी उन्होने, 
शायद भूल गए मुझे ....वो भी.....
तुम्हारी तरह ।
नए मगर अंजाने लोगों ने भी
किया नज़रअंदाज़ सा  मुझे ,
मुझे !...!....!
खोजते रहते थे दो नैन जिसे,
सुबह से देर रात ढले,
बरसते अंधेरे में  खिड़की के
उस तरफ जलते दिये से....उसे,
आज हर एक ने किया
अनदेखा ।




"विक्रम"

 

 

शादी-विवाह और मैरिज ।

आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...