Saturday, 7 April 2012

मेहमानवाजी

सुना है आज पड़ोसी मुल्क से कोई बहुत बड़ी हस्ती का पदार्पण होने वाला है . मिडिया से लेकर सरकारी तंत्र तक पलक पावड़े बिछाये बैठा है.वैसे तो इस पड़ोसी मुल्क से अक्सर आतंकवादी ही इधर घुमने आते हैं, मगर इस बार एक खीसे निपोरते हुए एक राष्ट्रपती आ रहा है , वो आ तो रहा है अपनी निजी (धार्मिक) यात्रा पे जियारत के लिए मगर हमारे नेता तलुवे चाटने का ये हसीन मौका हाथ से नहीं जाने देंगे . तलुवे चाटते हुए चाटुकारिता भरी हुई नज़र से अमेरिका को देखेंगे और मन ही मन कहेंगे की 'देखो ,जैसा आपने कहा उस से भी ज्यादा कर रहे हैं '.

टीवी पे सुबह से उसके कार्यक्रम का एक एक पल का व्रतांत सुनाया जा रहा है . (मेरा ये लेख लिखे जाने तक वो बाथरूम में सायद नहा रहा है ) . दोपहर के खाने के मेनू में ऐसे ऐसे व्यंजनों के नाम गिनाये जा रहे हैं जिनमे बहुतों के कभी नाम सुने ही नहीं . खाने में  शाकाहारी ,मासाहारी दोनों ही शामिल किये गए है . जो इस प्रकार हैं :
शाकाहारी व्यंजन : मेलन-मिंट का ठंडा सूप, सरसों के फूल, सब्ज शम्मी कबाब, मिनी मसाला डोसा, तोरई भुजिया, मकई पालक, भिंडी कुरकुरी अवियाल, मंूग दाल तड़का, सब्ज बिरयानी, कई तरह की रोटियां, ब्लूबेरी मूसे, गुड़ का संदेश, फिरनी, फल।
मांसाहारी व्यंजन : जैतूनी मुर्ग सीख, गोश्त बड़ा कबाब, करेली दाल गोश्त, मुर्ग कोफ्ता मखनी, सिकंदरी खुश्क रान, कच्ची गोश्त बिरयानी।

बेचारी जनता को अप्रत्यक्ष रूप से बता दिया गया है की कम से कम आज के दिन अपना मुंह बंद रखे और रोज की तरह भ्रष्टाचार,महंगाई ,बिजली,पानी की चिल्लमचिल्ली मचाकर मूड ख़राब न करे . हमारे नेता मेहमान नवाजी में हमेशा अव्वल ही रहे हैं , पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति के स्वागत लिए दिन रात एक कर दिया था ,मगर हाथ कुछ नहीं आया . खैर वो तो शक्तिशाली राष्ट्र का शक्तिशाली नुमाईन्दा था मगर ये साहब जो आज तसरीफ ला रहे हैं इन बेचारों की तो कभी अपने घर में भी नहीं चली . पिछले दिनों मुशरफ आया तो तोहफे में कारगिल दे गया , अब देखते हैं ये साहब क्या तोहफा देते हैं.

बहुत दुःख होता है ,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अमन शांति के लिए दहशतगर्दों के आगे हाथ फ़ैलाने पड़ते हैं. हर बार अपनी तरफ से शांति की पहल करके हम अपन कह्जोरी ही जता रहे हैं . हम कमजोर नहीं हमारी नुमाइंदगी कमजोर है जिसकी बदौलत कारगिल, संसद, 26 /11 ,आगरा क्रिकेट, अजमेर, हाफिज़ सईद ......जैसे शब्दों की इबारत लिखी जाती है .



Thursday, 15 March 2012

ताऊ श्रवण

( लेख थोडा लम्बा है, मगर एक इंसान की सच्ची कहानी है जिसका सम्पूर्ण जीवन सामाजिक कु-प्रथाओं की भेंट चढ़ गया )




गाँव के मुख्य चौक के किनारे बने चबूतरे पर हम अक्सर ताऊ श्रवण को पसरे हुए पाते थे . वो या तो कुछ पढ़ रहे होते या रेडियो में फ़िल्मी गाने सुन रहे होते . गाँव के बच्चे उन्हें सिर्फ "ताऊ" का संबोधन करते थे क्योंकि हरियाणा और सीमावर्ती इलाके राजस्थान ( जहाँ मेरा गाँव है) में "जी" या "आप" लगाना व्यंग्य की श्रेणी में आता था . ताऊ श्रवण शारीरिक रूप से काफी हट्टे कट्टे और बलिष्ठ काया के स्वामी थे .उन्होंने अपनी  उम्र को स्थिर  मान लिया था. वो अपने आप को आज भी युवाओ का मुख्य प्रतिद्वन्द्वी मानते थे, हालाँकि वो 65 बसन्त गुजार चुके थे .

अपने हमउम्र बूढों लोगों से ताऊ को सबसे ज्यादा चिड़ होती थी , वो ताऊ को सठियाया हुआ समझते थे ,और ताऊ उनके सम्पूर्ण जीवन को ही निरर्थक समझते थे . इसका एक खास कारण जो मुझे लगता था वो था , ताऊ का थोडा बहुत पढ़ा लिखा होना और अन्य का अंगूठा छाप होना , बाकि सब ताश खेलते रहते मगर ताऊ को ताशों के खेल से बहुत नफरत थी .

किताबों से ताऊ ने काफी ज्ञान अर्जित कर रखा था जिसको वो समय समय पर बखान करने से नहीं चुकते थे .  उनके बखान से  अंगूठा छाप ग्रामीणों के लिए तो भैंस के आगे बीन बजाने वाली स्थिति होती थी . ताऊ श्रवण को किताबें पढने का बहुत शौक था , मगर धार्मिक किताबों से उनका छत्तीस का आंकड़ा था I उनकी पसंदीदा किताबों में कादम्बनी, गृहशोभा, रोमांटिक उपन्यास होते थे मगर चंदामामा
और बालहंस जैसी किताबों से भी परहेज नहीं करते थे .   

गाँव का कोई न कोई युवा शाम को शहर से लौटते वक़्त पढ़ा हुआ अखबार ताऊ के हाथ में ऐसे थमा देता जैसे  ये  उन्ही के लिए ही ख़रीदा हो , और बदले में ताऊ उसको अपनी कोई पढ़ी हुई किताब देना नही भूलते ताकि ये लेन देन का सिलसिला निरंतर चलता रहे . वो अपने आप में एक छोटी लाईब्रेरी थे , अपनी किताबें एक दुसरे को देते रहते मगर बदले में उनसे किताब लेना कतई नहीं भूलते .

उनके दो ही शौक थे, किताबें और रेडियों . उम्र के हिसाब से उनको चलने फिरने में मुश्किल तो होती थी, मगर वो किताब के लिए गाँव के हर युवा के घर तक पहुँच जाते . अक्सर चौक में लेटे रहने वाले इस प्राणी को अकस्मात अपने घर के सामने देखकर घर की महिलाये संकोचवश इधर उधर छुप जाती . उन दिनों गाँव में औरतें अक्सर बड़े बूढों के सामने नहीं आती थी , आज तो हालात काफी बदल चुके हैं.  अपने मोह्हले में ताऊ को आया देख मोह्हले के बच्चे कोतुहलवश पीछे लग जाते , और ताऊ मस्त हाथी की तरह लहलहाते हुये चले जाते. बच्चो का हुजूम कुछ दूर पीछे पीछे चलता और बाद में लौट आता मानो किसी सर्कस से लौटे हों .



ताऊ आंशिक रूप से कुवारें थे . सुना था उनके बड़े भाई के निधन के बाद उनकी भाभी को उनके पल्ले लगा (बांध) दिया था l ताऊ जिस जाति से सम्बन्ध रखते थे उसमे अक्सर परिवार के छोटे लड़के को कुंवारा रखने का रिवाज था ताकि कभी शादी शुदा के साथ कुछ अप्रिय घटना घट जाये तो उसकी विधवा को उसके नाम की चूडियाँ पहनाई जा सके.   मगर ताऊ को सायद औपचारिक विवाह रास नहीं आया और वो अपना मलंग जीवन ही जीते रहे  .

ताऊ का मकान हमारे स्कूल जाने के रास्ते में पड़ता था .  शरारती बच्चे आते जाते वक़्त ताऊ पे एक सरसरी नजर डालते और उसके बाद उनके घर की दीवारों पे लटके अमरबेल के पोधे की कुछ बेलें तोड़ कर भाग जाते l ताऊ उनके पीछे पीछे गलियां देते हुए जाते और कुछ दूर तक उनको भगाकर वापिस आ जाते . बच्चे इस क्रिया को महीने में ३ य ४ बार दोहराते इसलिए ताऊ को उनकी हरकतों का पूर्वानुमान लगाने में खासी परेशानी होती थी . 

गाँव में पढ़े लिखे बुजर्गों में एक मात्र ताऊ ही थे इसलिए हमारे स्कूल के प्रधानाचार्य १५ अगस्त या २६ जनवरी जैसे उत्सव में उन्ही को आमंत्रित करते थे l ताऊ जैसे इसी मौके की तलाश में रहते थे l वो वक़्त पर पहुंचकर मुख्य अतिथि वाली कुर्सी पर अपने भरी भरकम शारीर को रख देते और चश्मे को ऊपर निचे करके सामने पक्तियों में बैठे उन शरारती बच्चो को तलाशने लगते l बच्चे भी कम नहीं थे, वो एक दुसरे के पीछे ऐसे छुपकर बैठते जहाँ ताऊ की दिव्य द्रष्टि नहीं पहुँच पाती थी l जब ताऊ को अभिभाषण के लिए कहा जाता तो ताऊ अपना भाषण शुरू करते . वो बताते की कैसे अंग्रेजो ने हम पे सितम ढाए थे और कैसे हम लोगों ने आजादी के लिए संघर्ष किया . इसके साथ साथ वो समाज में फैली सामाजिक कुप्रथाओं की भी खुलकर धजियाँ उड़ाते रहते . वो क्रांतिकारियों के कारनामों की तारीफ करते मगर बीच बीच में उन बच्चो को भी कोसते जो उनकी बेल तोड़कर भाग जाते थे l उनकी इस बात पर छुपकर बैठे बच्चे एक दुसरे की तरफ देखकर मुस्कराते और उधर सभी अध्यापकगण तथा अन्य
अतिथि भी मुस्कुराने में उनका साथ देते .



ताऊ से मेरी स्कूल के दिनों से ही अच्छी पटरी बैठती थी . वो मुझे बेटे और एक दोस्त की तरह मानते थे l मेरे और उनके बीच किताबों का लेन देन चलता रहता था में अक्सर समय बिताने के लिए उनके पास बैठ जाया करता था l में जितनी देर उनके पास बैठता था उस दरमियाँ अगर गाँव का कोई भी वृद्ध उधर से गुजरता तो ताऊ फुसफुसाकर उसके बारें में बुरा भला कहते और उसके दूर चले जाने के बाद मुझ से पूछते ,"किसलिए पैदा हुए ये लोग ? साले खा पी के सो जाते हैं , दुनिया में क्या हो रहा है कुछ पता है इनको ? ,धरती के बोझ " में मुस्करा के ताऊ का समर्थन करता .

ज्यादातर लोग उनके एकाकी और अक्खड़ स्वभाव के कारण उनको पसंद नहीं करते थे लेकिन वो भी अन्दर से एक आम इंसान की तरह ही थे l बस लोग उनको समझ नहीं पाए . एक बार किसी किताब में लिखी प्रेम कहानी के बारें में मेरे और ताऊ के बीच वार्तालाप चल रहा था . किताब की कहानी इतनी भावुक थी की ताऊ खुद बहुत भावुक हो गए और वो अपने जीवन का एक वाकया मुझे बताने लगे .

उन दिनों श्रवण अपनी युवा अवस्था में थे . किसी परिचित मारवाड़ी के साथ आसाम चले गए और वहां उसकी दुकान में काम करने लगे . मारवाड़ी ने श्रवण के लिए एक किराये का मकान खोज कर दिलवा दिया था l वो दिनभर दुकान में और शाम को अपने मकान में आकर सो जाते.  मकान एक स्थानीय निवासी का था जिसमे मकान मालिक अपनी पत्नी तथा एक जवान बेटी बिनोदिनी के साथ रहता था. वो लोग ताऊ का खास ख्याल रखते थे , यहाँ तक की उनका खाना भी वही लोग बनाते थे.  धीरे धीरे
बिनोदिनी 25 वर्षीय श्रवण के प्रति आकर्षित होने लगी . 

युवा दिलों को प्रेम करना सीखना नहीं पड़ता वो स्वत: ही सीख़ जाते हैं l गृह स्वामी और स्वामिनी को दोनों के परस्पर मिलने से कोई आपति नहीं थी l उन्होंने मन ही मन ताऊ को अपना दामाद मान लिया था l वक़्त बीतता गया और ताऊ अपनी दुनिया में बहुत ख़ुशी से जीवन बसर करने लगे. कहते हैं की किस्मत कब बदल जाये किसी को कुछ पता नहीं होता . श्रवण और बिनोदिनी की किस्मत ने भी एक करवट ली . एक साल बाद अचानक ताऊ को पता चला उनके बड़े भाई की एक हादसे में मौत हो गई . वो आनन फानन में वहां से आ गए . गाँव पहुंचकर स्वछंद जीवन जीने वाले श्रवण के पैरों में सामाजिक बेड़िया पहना दी गई l उनकी भाभी को उनके नाम की चूड़िया पहना दी गई l युवा इच्छाएं परिवार और समाज की भेंट चढ़ चुकी थी l किस्मत की एक करवट ने दो युवा दिलों की हसरतों को एक झटके में मसलकर रख दिया था l देखते देखते पाँच साल गुजर गए मगर श्रवण आज तक बिनोदिनी को नहीं भुला पाए थेl

 एक दिन अचानक घरवालों को बिना बताये आसाम के लिए निकल गए l दो दिन बाद वहां पहुंचे तो पहले मारवाड़ी के पास गए . मारवाड़ी उनको देखते ही चौंक गया और उनका हाथ पकड़कर दुकान के अन्दर ले गया l " अरे ! , तुम यहाँ क्यों आये हो ? वो लोग तुम्हे मार डालेंगे " , मारवाड़ी ने डरते हुए कहा . बाद में वो श्रवण को अपने घर ले गया तथा उसके जाने के बाद से अब तक का सारा हाल बताया.  वो लोग श्रवण के ऐसे चले जाने और फिर कई दिनों तक ना आने से बहुत नाराज हो गए तथा अपने परिचितों को लेकर अक्सर दुकान में आ धमकते थे .

उन लोगों के हाथों में खुखरीनुमा हथियार होता था जिसको ऊपर उठाकर वो अपनी स्थानीय भाषा में काट डालने की धमकी देते थे . दो सालों तक ये सिलसिला चलता रहा बाद में बिनोदिनी की शादी उन्ही के समाज के एक दबंग के साथ करदी . श्रवण थे तो युवा मगर पराये देश में ऐसे हालात ने उनको बहुत डरा दिया था और वो उसी दिन वहां से भागकर वापिस गाँव आ गए .

 इतना कहकर ताऊ चुप हो गए ..... फिर ना जाने कब कहाँ से वक़्त की दरारों में फंसे कुछ आसूँ, ताऊ की आँखों से निकल किताब पे आ गिरे . एक अक्खड़ आज अबोध बच्चे सा सुबक कर रह गया था . आज चालीस सालों से दबे तूफान ने सिर उठाया तो मलंग  ने फिर से उसे अपने अन्दर ही कुचल दिया.

आज से करीब दो साल पहले गाँव गया तो पता चला श्रवण ताऊ नहीं रहे . सुनकर बहुत दुःख हुआ l आज जब भी गाँव जाता हूँ , तो उस चौक में गाँव की पंचायत द्वारा छोड़ा गया सांड जुगाली करता हुआ मिलता है जो अक्सर गाँव के बूढों की तरफ फुंकारता रहता है.  मुझे ना जाने क्यों उसको देखकर ताऊ की याद आ जाती है. ताऊ भी ऐसे ही मस्त मौला की तरह इसी चौक में जमे रहते थे. में ताऊ के जीवन की कहानी याद करके अक्सर अपने आप से कह देता हूँ की "कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता ...कभी जमीं तो कभी आसमान नहीं मिलता" .


( मेरा ये स्मृति लेख ताऊ श्रवण को श्रधांजली है l अगले जन्म में भगवान उनको वो सब खुशियाँ दे जो उनको इस जन्म में मयस्सर नहीं हुई )

"विक्रम"







Tuesday, 6 March 2012

अनुशासन


घटना आज से करीब एक साल पहले की है .में अपने ऑफिस के किसी काम से पूना से बंगलोर आ रहा था. एअरपोर्ट के वेटिंग हाल में अन्य यात्रियों के साथ मैं भी सिक्योरिटी चेक का इन्तजार कर रहा था . मेरे सामने एक विदेशी जोड़ा अपने पांच छ: साल के बच्चे के साथ खेल कर टाइम पास कर  रहा था  . कुछ समय बाद बच्चे के पिता ने पास के काउंटर से एक चॉकलेट खरीदा और  उसका Wraper (कवर) उतार कर बच्चे की तरफ बढ़ाया . खेलते हुए बच्चे ने अपने पापा के दोनों हाथो को बारी बारी से देखा .एक में चॉकलेट और दुसरे में उसका खली कवर था. बच्चे ने तुरंत चॉकलेट से उतारा गया कवर लिया और उसको पास के डस्टबिन में डाल दिया और फिर वापिस आकर दुसरे हाथ में पकड़ी चोकलेट को लेकर खाने लगा .

कहने को एक छोटी सी घटना है मगर अपने आप में बहुत बड़ी है . उस पाँच साल के बच्चे में कितना अनुशासन है वो अपने आप में बहुत बड़ी बात है .हम चाहे विदेशी लोगों के रहन सहन में कितने ही मीन मेख निकालें मगर अनुशासन में वो हमसे काफी आगे हैं. आज आप किसी ट्रेन ,बस रेलवे स्टेशन याबस स्टैंड में जाकर देखें. मूंगफली के छिलके ,बीडी सिगरेट के टुकड़ों का अम्बार मिलेगा , उत्तर प्रदेश या बिहार में देखिये , सार्वजानिक  स्थानों में पान थूककर बेहूदगी की हदें पार की जाती हैं . सिंगापोर जैसी जगह में सड़क पे थूकने से आपको जेल की हवा खानी पड़ सकती  है . मगर यहाँ आपको पूरी आजादी है कहीं भी थूकने की  और थूकने के बाद आप  बड़े रौब से ये जुमला  उछाल सकते हैं की "इस देश की जनता और सरकार ने  देश का क्या हाल  कर रखा है ,  कितनी गंदगी है इसको   साफ़ भी नहीं किया जाता ".      .........  मेरा भारत महान ?
-विक्रम

Wednesday, 25 January 2012

टूटे फूटे अरमान




टूटे फूटे से अरमान उठा  लाया हूँ  
ताकि  पहचान  सको बरसों बाद  मुझे  
वो खिड़की ,वो पगडंडी ,वो छत की मुंडेर ...  
कुछ भी तो नहीं बदला |

फिर क्यों है अनजाना सा  हर एक लम्हा,
क्यों पसरी है ख़ामोशी 
उस खिड़की से लेकर 
सामने के बंद दरवाजे तक  |     
जहाँ कभी निष्प्राण से निहारते थे ,
लयबद्ध  धडकते  दो जवां दिल |
नजरो की  कोमल सलाइयों  से
बुना करते थे  हसीन खवाब |

सामने की वो झील सूख  चुकी है   
जहाँ रात भर झींगुर गाते थे  |
धुप या बरसात का बहाना  बना  
पीछे खड़ा  वो पेड़  भी मुरझा  चूका है |


छत का वो कोना   मायूस  पड़ा   है 
जहाँ कभी हसीन  ख्वाब मचलते थे 
वो मुंडेर भी उन संजीदा यादों को
बचा न सकी वक्त के थपेड़ों  से   


सड़क  बन  चुकी वो पतली सी पगडंडी ,
पथरों में दब गई  किनारों की वो हरी घास
प्रतिस्पर्धा रखते हैं  मेरे अरमानों से
छत पे खाली पड़े  टूटे फूटे से  गमले 

"विक्रम"

Thursday, 12 January 2012

उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत



में उत्तर भारत से सम्बन्ध रखता हूँ मगर पिछले लगभग एक दशक से दक्षिण भारत में रह रहा हूँ .इस दौरान मैंने उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में बहुत सा फर्क देखा है , जिसमे खान पान, रहन सहन , वेशभूषा से लेकर आचरण तक शामिल है .आज में कुछ खास बातों का जिक्र करूँगा जो हमें उत्तर भारत में देखने को नहीं मिलती.यहाँ के लोग बहुत धर्मिक प्रवर्ती के होते हैं . यहाँ पर चोरियां बहुत कम होती है. लोगों को सरेआम झगड़ते हुए शायद ही कभी देखा जाता है . बस या रेल की टिकिट के लिए आपको बहुत कम इन्तजार करना पड़ता है , तथा टिकिट के लिए आपको छुट्टे पैसे देने के लिए मजबूर नहीं किया जाता जैसा की उत्तर भारत में अमूमन देखा जाता है . यहाँ के सरकारी कर्मचारी भी आप से बहुत अपनत्व से बात करते है .


नई तकनीक को इन राज्यों ने बहुत अपनाया है , राशन कार्ड , गैस बुकिंग ,टिकटिंग ,टैक्स , टेलीफ़ोन बिल जैसे काम ऑनलाइन कर सकते हैं .शिक्षा के क्षेत्र में तो दक्षिण भारत के ये ४ राज्य सदा अवल ही रहे हैं . अकेले कर्नाटक में इतने इंजीनियरिग कोलेज हैं जितने पुरे भारत में नहीं होंगे .


एक से एक भव्य मंदिर यहाँ के हर शहर में देखने को मिलेंगे , मगर एक बात जो यहाँ चुभती है वो है मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए आपको पैसे देने पड़ते हैं . और उसपे भी अगर आपको दर्शन करने की जल्दी है तो आप जितने ज्यादा पैसे देंगे उतनी जल्दी आपको दर्शन करने को मिलेंगे . मंदिरों में दान देने के मामले में यहाँ के लोग सबसे आगे हैं .

कोई चाहे कितना भी गरीब हो अगर उसकी मनोकामना पूर्ण हो गई तो वो अपने पास के पुरे पैसे जेवरात तक मंदिर के दान बॉक्स में डाल देता है , यानी भगवान को दान देने में तो भामाशाह जैसा दिल है .तिरुपति बालाजी का मंदिर पूरी दुनिया में सबसे धनाढ्य मंदिर है , जहाँ साल में करोड़ो रुपयों के तो बाल बेचे जाते हैं जो दर्शनार्थियों द्वारा मुराद पूरी होने पर कटवाए जाते है. यहाँ तक की औरतें भी अपने पुरे बाल कटवाकर आती हैं मंदिर में . यहाँ पर ९०% लोग सुबह पूजा करने के बाद ही चाय नाश्ता करते हैं पूरा परिवार सुबह नहाकर पूजा करता है . औरतें बिना घर के आगे रंगोली बनाये कोई काम नहीं करती , उनके द्वारा कुछ ही मिनिटों में घर के आगे बनी गई रंग बिरंगी रंगोली हर किसी का दिल मोह लेती है .

चाय से लेकर सब्जी बेचने वाला तक अगर हिंदी ना भी समझे तो भी आपको अंग्रेजी में वन टू थ्री बोलकर समझा देगा , लेकिन ज्यतादर आपसे हिंदी में वार्तालाप की कोशिश करेंगे . क्या हम उत्तर भारत में कभी किसी दक्षिण भारतीय से उसकी भाषा में एक शब्द भी बोलते हैं ? नहीं


शराब के मामले भी दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत के लोगों से आगे हैं .पूजा पाठ के साथ शराब के भी बहुत शौकीन है यहाँ के लोग यहाँ पे आपको जहाँ शराब का ठेका मिलेगा उसके आस पास कोई ना कोई मंदिर भी जरुर मिलेगा , और दो चार कदम पे मीट की दुकान भी मिलेगी यानी धर्म और निजी जीवन दोनों का बखूबी तालमेल यहाँ देखने को मिलेगा .दक्षिण भारत के ४ राज्य ( आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु,कर्नाटका और केरल ) बाकि देश से कुछ बातों में काफी भिन्न है .तमिलनाडु में हिंदी भाषी लोग ना के बराबर है. पुरे तमिलनाडु में आपको सायद ही कोई हिंदी बोलने या समझने वाला मिलेगा लेकिन इसके विपरीत आंध्रप्रदेश,केरल और कर्नाटका में हिंदी की स्थिति बेहतर है . एक और खास बात है जो  में  आपसे  बाँटना  चाहूँगा  वो है   इन चारों  राज्यों की अलग अलग भाषा. उत्तर भारत  में अधिकतर राज्यों की भाषा एक दुसरे से मिलती जुलती है ,या फिर वो हिंदी बोलकर एक दुसरे से संवाद कर लेते हैं . मगर इधर एक दुसरे की भाषा बिलकूल नहीं समझते ,यहाँ तक की लिपि भी पूरी तरह से अलग है .

 
खान पान के मामले में ४ राज्यों में चावल और चावल से बने अन्य पकवान ही बहुतायत में मिलेंगे केरल में नारियल का तेल सब्जी बनाने में उपयोग में लाया जाता है जो को उत्तर भारतीयों को शायद

ही पसंद हो , दक्षिण भारत में कुछ खास पकवानों के नाम इस तरह हैं , लेमन राईस ,सांभर राईस , इडली , मेदू वडा , रश्म ,डोसा ,उपमा , पोंगल आदि मगर इन सब में ९९% चावल और नारियल जरुर मिलेगा .




यहाँ के त्यौहार भी अलग ही हैं पोंगल, ओणम ,पूरम ,चितिरै कुछ खास त्यौहार हैं . उत्तर भारत की तरह यहाँ होली दिवाली जैसे त्यौहार को लोग कम जानते है इसलिए ना के बराबर ही मनाते है .यहाँ तक की दक्षिण भारत में  पंचाग भी अलग होता है.

मगर चाहे जो भी हो , यही तो पहचान है हिंदुस्तान  की . "विभिन्नता  में एकता "

//विक्रम//


Saturday, 7 January 2012

दस्तक

  
     स्थिर,निष्प्रभ,निश्तब्ध दिल पे
    गाहे बगाहे दे जाती हो दस्तक
    और छेड़ जाती हो हलचलों का 
     एक अंतहीन सा सिलसिला...




 

इस कशमकश में बटोरने लगता हूँ
उन हसीन पलों को, जो साक्षी थे
कभी उस सफ़र के जो बसर हुआ
बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने





बस यही मुसलसल रिश्ता है
हमारे दरमियाँ निभाने को ,
जो बसर हो रहा है शिद्दत से
एक तन्हा सफ़र की तरह .....



में जिंदा हूँ तो बस, वक़्त बेवक्त की
आहटों ,दस्तकों और धडकनों
के धमाकों से गिरी यादों के पलों
को उठाकर सहेजने को ,क्योंकि
कुछ तो बहाना हो नीरस सा जीवन
व्यतित करने को ... . . . .

"विक्रम"





















Sunday, 1 January 2012

चेहरा




आता है नजर 
वक़्त की धुंध में  एक धुंधला सा चेहरा 
   

बना लेता हूँ   उसके   नयन नक्श फिर
धीरे से उभर आता है तेरा अक्श फिर


हर  रोज यूँ में ख्यालों  में  बनाकर तुम्हे   
बस बैठा लेता हूँ  सामने  सजाकर तुम्हे

रोज की भांति  गिले-शिकवों का  एक दौर
चला हमारे दरमियाँ  इस और  से  उस ओर

 
अंत में हम अनन्त मनुहार के उत्कर्ष पे
जा मिले फिर यूँ प्यार के चरमोत्कर्ष पे

जाता है निखर
यूँ  प्यार के द्वंद  में  दूध सा धुला  चेहरा 

"विक्रम"
    

शादी-विवाह और मैरिज ।

आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...