Saturday, 4 June 2011

मेरे मनपसंद शेर

:

- मेरे मनपसंद शेर :-


गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे
ज़मीं पे नक्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा
-फ़िराक़ गोरखपुरी।


मुख़ालफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूँ ।
-बशीर बद्र


वो आये हैं पशेमां लाश पर अब,
तुझे अय ज़िंदगी लाऊं कहां से ।
--मोमिन


जब मैं चलूं तो साया भी अपना न साथ दे,
जब तुम चलो, ज़मीन चले, आस्मां चले ।
-जलील मानकपुरी


हम तुम मिले न थे तो जुदाई का था मलाल,
अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गयी ।
-जलील मानकपुरी


मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है,
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।
-‘नीरज’


बहुत कुछ पांव फैलाकर भी देखा ‘शाद’ दुनिया में,
मगर आख़िर जगह हमने न दो गज़ के सिवा पायी।
-‘शाद’ अज़ीमाबादी


मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं,
ज़िंदगी भी जान लेकर जाएगी।
-‘जोश’ मलसियानी


दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई,
लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया।
-‘सफ़ी’ लखनवी


नींद भी मौत बन गयी है
बेवफ़ा रात भर नहीं आती।
-‘अदम’


इसी फरेब में सदियां गुजार दीं हमने,
गुजरे साल से शायद ये साल बेहतर हो।
-‘मेराज’ फैजाबादी


बड़ी मुद्दत से तनहा थे मेरे दुख
खुदाया, मेरे आँसू रो गया कौन
-परवीन शाकिर


मेरे मौन से जिसको गिले रहे क्या-क्या
बिछड़ते वक़्त उन आँखों का बोलना देखे
-परवीन शाकिर


बातों का भी ज़ख़्म बहुत गहरा होता है
क़त्ल भी करना हो तो बेख़ंज़र आ जाना
-सुरेश कुमार


हम उसे आंखों की देहरी नहीं चढ़ने देते
नींद आती न अगर ख्वाब तुम्हारे लेकर
-
आलोक

तरतीब-ए-सितम का भी सलीका था उसे
पाहे पागल किया और फिर पत्थर मारे

खोला करो आँखों के दरीचों को संभल कर
इनसे भी कभी लोग उतर जाते हैं दिल में


"चुपके से भेजा था एक गुलाब उनको
खुशबू ने शहर भर में मगर तमाशा बना दिया"

"वहां से पानी कि एक बूँद भी न निकली
तमाम उम्र जिन आँखों को  हम झील लिखते रहे"

"उस शख्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं आता
जाते जाते खुद को मेरे पास छोड़ गया"

"कोई पूंछता है मुझसे मेरी ज़िन्दगी कि कीमत
मुझे याद आता है तेरा हलके से मुस्कुराना"

"इन्सान की ख्वाहिशों की इन्तहा नहीं, .....
दो गज़ जमीन भी चाहिये दो गज़ कफ़न के बाद"

"किस रावण की बाहें काटूँ,किस लंका में आग लगाऊं
घर घर रावण,घर घर लंका,इतने राम कहाँ से लाऊं"

बहुत मुश्किल से होता है तेरी "यादों" का कारोबार,
मुनाफा कम है लेकिन गुज़ारा हो ही जाता है...


मौजूद थी उदासी; अभी पिछली रात की,
बहला था दिल ज़रा सा, के फिर रात हो गयी।


तेरी हालत से लगता है तेरा अपना था कोई,
इतनी सादगी से बरबाद, कोई गैर नहीं करता।


अपने सिवा, बताओ, कभी कुछ मिला भी है तुम्हें,
हज़ार बार ली हैं, तुमने मेरे दिल की तलाशियाँ


उस के दिल में थोड़ी सी जगह मांगी थी मुसाफ़िरों की तरह,
उसने तन्हाइयों का इक शहर मेरे नाम कर दिया।


अब मौत से कहो, हम से नाराज़गी ख़तम कर ले,
वो बहुत बदल गए हैं, जिनके लिए जिया करते थे
!!

कितना मुश्किल है ये जिंदगी का सफ़र भी,
खुदा ने मरना हराम किया, लोगों ने जीना हराम


सोचता हूँ के उसके दिल में उतर कर देखूँ,
कौन रहता है वहाँ, जो मुझे बसने नहीं देता
|

किसी से जुदा होना इतना आसान होता फ़राज़
 तो जिस्म से रूह को लेने फ़रिश्ते नहीं आते।।


-Unknown

तुम इसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठे,फराज़
उसकी आदत है निगाहों को झुकाकर मिलना


बात किस्मत की है फराज़ जुड़ा हो गए हम
वरना वो तो मुझे तक़दीर कहा करती थी


कुछ ऐसे हादसे भी जिंदगी मे होते हैं "फराज़"
की इंसान बच टी जाता है मगर जिंदा नहीं रहता


दुखो ने मेरे दमन को यूं थाम रखा है "फराज़"
जैसे उनका भी मेरे सिवा कोई अपना नहीं रहा
"

उँगलियाँ आज भी इसी सोच मे गुम है "फराज़
उसने किस तरह नए हाथ को थामा होगा "



आँसू, आहें, तनहाई ,वीरानी और गम-ए-मुसलसल
एक जरा सा इश्क हुआ था क्या क्या विरासत मे दे गया



पूछा था हाल उसने बड़ी मुद्दत के बाद
कुछ गिर गया आँख मे ये कहके रो दिये



जाने कैसे जीते हैं लोग यादों के सहारे...
मैं तो कई बार मरता हूँ एक याद आने पे....

 
और इससे ज्यादा क्या नरमी बरतूं...
दिल के ज़ख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह....
 
ढलने लगी थी रात... कि तुम याद आ गए,...
फिर उसके बाद रात बहुत देर तक रही....

तुम्हारे शहर मे मैयत को सब कन्धा नहीं देते....,
हमारे गाँव मे छप्पर भी सब मिलकर उठाते

मौत तो मुफ्त में बदनाम हुई है....
जान तो कम्बखत ये ज़िन्दगी लिया करती है

किस कदर मुश्किल है मोहब्बत की कहानी लिखना....
जिस तरह पानी से......... पानी पे .....पानी लिखना...
 

रोज़ रोते हुए कहती है ....ज़िन्दगी मुझसे फ़राज़...
सिर्फ एक शख्स की खातिर.... मुझे यूँ बर्बाद न कर.

 
अभी मशरूफ हूँ काफी....कभी फुर्सत में सोचूंगा....
कि तुझ को याद रखने में....मैं क्या भूल जाता हूँ.....


तुझ से अब कोई वास्ता नहीं है लेकिन.....
तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तनहा गुज़रता है....

 

अजीब कशमकश कि जान किसे दें "फ़राज़"
वो भी आ बैठे हैं.....और मौत भी,......
 

अगर वो पूँछ लें हमसे.....तुम्हे किस बात का ग़म है......
तो किस बात का ग़म है.....गर वो पूँछ लें हमसे....
 

किसी से जुदा होना गर इतना आसन होता.....
तो जिस्म से रूह को लेने फ़रिश्ते नहीं आते.....


सुना था ज़िन्दगी इम्तेहान लिया करती है "फ़राज़"
यहाँ तो इम्तेहानो ने ज़िन्दगी ले रख्ही है.....
 

अब तो दर्द सहने कि इतनी आदत हो गयी है"फ़राज़"
कि दर्द नहीं मिलता तो दर्द होता है.....



"सियासत सूरतों पर इस तरह एहसान करती है 
ये आंख्ने छीन लेती है, और चश्में दान करती है"




कुछ रोज तक तो मुझको तेरा इंतजार था
फिर मेरी आरजूओं ने बिस्तर पकड़ लिया

 

फिर किसी ने लक्ष्मी देवी को ठोकर मार दी 
आज कूड़ेदान मे फिर एक बच्ची मिल गई.....

 

जिसने भी इस खबर को सुना सिर पकड़ लिया
कल एक दिये ने आँधी का कालर पकड़ लिया

-मुन्नवर राणा

 

बस दुकान के खोलते ही झूठ सारे बिक गए
एक तन्हा सच लिए में शाम तक बैठा रहा .....

 

"परदेसी ने लिखा है जिसमें, लौट न पाऊँगा 
विरहन को उस खत का अक्षर-अक्षर चुभता है "

 

"बेटी की अर्थी चुपचाप उठा तो ली
अंदर अंदर लेकिन बाप टूट गया"

 

"स्टेशन से वापस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं
पत्ते देहाती रहते हैं, फल शहरी हो जाते हैं"

 

"ग़रीबी क्‍यों हमारे शहर से बाहर नहीं जाती
अमीर-ए-शहर के घर की हर एक शादी बताती है"

 

कहाँ आसान है पहली मुहब्बत को भुला देना
बहुत मैंने लहू थूका है घरदारी बचाने में

 

 

ये अमीरे शहर के दरबार का कानून है
जिसने सजदा कर लिया तोहफे में कुर्सी मिल गई

- मुन्नवर राणा

 

 

ये बात अलग है की खामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग बड़े हैं वो बड़े रहते हैं....



हमारे मुल्क में खादी की बरकते हैं मियां।
चुने चुनाए हुए हैं सारे छटे छटाये हुए...." 

 

"उखड़े पड़ते है मेरी कब्र के पत्थर ,हरदिन
तुम जो आजाओ किस दिन तो मरम्मत हो जाए"

 


"मिलाना चाहा है जब भी इंसान को इंसान से

तो सारे काम सियासत बिगाड़ देती है"

- राहत इंदौरी
 
 
 
 


 







Saturday, 21 May 2011

आमंत्रण




मैने सहस्त्रो आमन्त्रण भेजे तुम्हे
आखिर कब आओगे ?

पिछली बारिश में , भीगते हुए राह देखता रहा
बारिस आई और गई , और मन तरसता रहा
रातभर झींगुरों के ताने और कीटो की चिकोटी
अपने दिल को तुम्हारा समझ कही खरी खोटी

पोष की सर्द रातों में रातभर आँखे बिछाई मैने
तब तेरे इन्तजार में ढेरों नींद गँवाई मैने
पत्थर बन चूका हूँ सर्द हवा के थपेड़ों से
और अब ओस बन लटक रह हूँ पेड़ो से

गर्मी की तपती दुपहरी में भी तेरा रस्ता देखा है
मगर हरबार की तरह निष्ठुर को हँसता देखा है
हर मोसम में जला है दिल तेरे इन्तजार में
विश्वास उठ रहा है अब यार-ये-इकरार में
मगर .....
आमन्त्रण भेजता रहूँगा .....मरते दम तक ....
क्योंकि....अब भी....
सवाल वही है ...
आखिर कब आओगे ?


"विक्रम"

दो शब्द






तुम से कुछ कह ना पाने का गम ,
जीवन के हर मोड़ पे कचोटता है मुझे ..
क्योंकि ... वो वक़्त हमारा नहीं था

जिन्दगी की दोड़ में जिन्दगी को ही पिछे छोड़ दिया मेने
ना जाने किस डर से तेरा दामन तनहा छोड़ दिया !

कुछ ला ना सका सिवा तेरी यादो के , चुरा के तुमसे
आज तन्हाइयों में उन्हें ही मरहम बना लेता हूँ !

कभी अकेले में उन्ही यादो के आलिंगन में रोते हैं
बस उस दरमियाँ हम कुछ और नजदीक होते हैं !

ना जाने कितना दखल है मेरा, तेरे ख्वाबों में
तुम तो मेरे खाव्बों को अपनी जागीर समझ बैठी !

यूँ तो तुम्हारा मेरे दिल की अँधेरी गहराइयों तक हक है
मगर अक्सर तुम और गहराइयों में उतर जाती हो , उफ !

चलो हम ऐसे ही रहें इस सूखे से जीवन में मगर ...
कल हम होंगे अपने सपनो के साथ एक साथ ..

और कहेगें एक दूजे से , वो सब कुछ जो ...हम
तब ना कह सके थे , किसी डर से हम.. क्योंकि तब
वक्त ने शब्द छीन लिए थे हमसे , मगर .... कल ...
कल हम वक़्त के हलक से वो शब्द निकाल लेंगे ..क्योंकि
तब वक़्त हमारा होगा ...


"विक्रम"

Saturday, 12 March 2011

गुगलवा बनाम गूगल


M Village Street





गुगलवा बनाम गूगल (व्यंग्य)
(Googlwa vs Google )

मुझे लगता है गूगल ने अपना नाम मेरे गाँव से लिया है क्योंकि ये तो जाहिर है की मेरा गाँव कम से कम २०० साल पुराना तो है और इस से ये साबित होता है की मेरे गाँव का नाम गूगल से नहीं पड़ा. गूगल का जन्म 1995 में हुआ था और मेरे दादा जी का जन्म 1895 को उसी गाँव में गूगल से 100 साल पहले हुआ था.

अगर आप गूगल को भोजपुरी (यूपी बिहारी )भाषा में Pronounce( उच्चारित ) करें तो वो "गूगल वा" है , यानि कुछ न कुछ तो है मेरे गाँव के नाम में वरना ऐसे ही उसका नाम ये नहीं होता | मेने कुछ रिसर्च किया तो लगा की दोनों में कुछ  विपरीत   समानता तो है जैसे :-

1. गूगल को पूरी दुनिया जानती है - मेरे गाँव को कोई नहीं जानता
2 .लोग गूगल पे दुनिया भर की जानकरी खोजते हैं - मेरे गाँव के लोग अपने ही गाँव में
    पानी,बिजली ,सड़के अस्पताल खोजते हैं जो कभी नहीं मिलते |

आप को मेरे गाँव की जानकारी गूगल (गूगल वा ) पर नहीं मिलेगी इसीलिए में कुछ जानकारी देना चाहता हूँ .  मेरे गाँव में कुछ धना सेठ भी है, जो कभी कभी गाँव के कुएं या मंदिर की टूटी हुई दिवार ठीक करवा कर उसपे अपने नाम की प्लेट लटका देते हैं या कभी सरकारी स्कूल में कुछ टूट फूट ठीक करवा देते हैं और इसका ढिंढोरा पिटवाना कतई नहीं भूलते. एक धना सेठ पुराने गेट को तोड़कर नया गेट लगाते वक़्त उसपे अपना नाम जरुर लिखवा देता है |

में एक बात बताना भूल ही गया , स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल का गाँव भी मेरे गाँव के पास में हैं और उस गाँव की हालत भी मेरे गाँव से अच्छी नहीं है | वैसे ये सब तो आज कल सभी गावों में होता है फिर में अपने गाँव को क्योंइसमें घसीट रहा हूँ ? वो इसीलिए क्योंकि बात मेरे गाँव और गूगल की चल रही है और दोनों आज के ज़माने में अपनी अपनीजगह पे जमे हुए हैं ,बे-खोफ के-धडक .एक दुनिया को खोज रहा है और दूसरा अपने आप को दुनिया में खोज रहा है |कोई है इनकी टक्कर का ? (हो सकता है गूगल की नज़र मेरे गाँव पे पड़े और उसकी (मेरे गाँव)  की  किस्मत चमक जाये )

"विक्रम" 13 -03 -2011

Friday, 18 February 2011

परिवर्तन

( Bangalore 19th Feb'2011)


आज वो दोनों एक दुसरे से नजरें चुराकर निकलते हैं और नहीं चाहते की कही आमना सामना हो |
वैसे दोनों सगे भाई हैं मगर समय के अनुसार आज एक दुसरे के प्रतिदवंदी बन गए| कही किसी जगह अगर एक का जिक्र आता है तो दूसरा ऊठ कर चल देता है यानि उसके बारे में कुछ सुनना
भी पसंद नहीं |  ये उन दोनों की कहानी नहीं घर घर की कहानी है और देखा जाये तो ये प्रकृति का नियम है जो आज भी एक रहस्य बना हुवा है की सही में प्रकृति का नियम है या मनुष्य ने बनाकर प्रकृति के नाम लगा दिया |

कभी दोनों भाई साथ खेलते थे , एक दुसरे का बहुत ख्याल रखते थे , उन की एक छोटी बहन थी वो भी अपने दोनों भाईयों के साथ ही रहती थी , साथ रहना, खाना,पीना खेलना सब कुछ एक दुसरे के बिना नहीं करते थे ये उन दिनों की बात है जब वो बच्चे थे मगर आज जवान होने के साथ अपनापन भूल गये | अब कोई इसको बचपना कहेगा या उस बचपन को बचपना कहे ,ये में तो क्या कोई भी नहीं समझ पाएगा | क्या इंसान जब बच्चा होता है तब ज्यादा समझदार होता है या जवान होने के बाद समझदार होता है |

कभी खेलते खेलते एक ही बिस्तर पर तीनो भाई-बहन थक कर सो जाया करते थे और सुबह के आलस में ए क दुसरे से चिपक कर सोने और उठने की कोशिश करते रहते थे ,कोई सोना तो कोई
उठाना चाहता था और इसी तरह फिर से वो खेलने लग जाते |

फिर आज ऐसा क्यों ? किसने उन सभी के बीच में ये अलगाववाद की दिवार खींच दी ? क्यों एक दुसरे से बच कर निकलना चाहते हैं , क्यों उनके दरमियाँ ये इतने फासले हुए और निरंतर बढते ही जा रहे हों | अक्सर हम कहते हैं की दुनिया ने उनके बीच दिवार खड़ी करदी , मगर क्या सचमुच दुनिया ने ऐसा क्या ? नहीं , ये उन लोगो ने खुद क्या , वो जवान होने के साथ साथ अपना विवेक खोते गये और साथ रहने की बजाय अकेले रहना पसंद करने लेगे | बस फर्क इतना है बचपन में खिलोने और मिठाई के लिए लड़ते थे और आज घर और जमीन के लिए |

दोनों अवस्थाओं में हरकतें एक जैसी हैं | तो क्या लड़ना झगड़ना इंसानी फितरत है ? अगर हाँ तो दोनों अवस्थावों के दुवंद में इतना फर्क क्यों ? क्यों आज भी वैसे की झगडा करके कुछ ही पलों में भूल नहीं जाते ?क्यों रंजिश पाल लेता है इंसान अपनों के साथ

" दुश्मनी करो तो जम कर करो मगर ! ये गुंजाइश हो
कि , जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिंदा ना हों !

"विक्रम"

Friday, 11 February 2011

पानी रे पानी ...!


१२-०२-२०११ ( बैंगलोर)

अभी कल ही एक दोस्त का फ़ोन आया बोला यार इधर (गाँव) में तो पिछले १५ दिन से पानी नहीं  आया बहूत परेशानी है , तुम लोग अच्छा हो जो शहर में रहते हो बिजली,पानी की समस्या तो नहीं
होती वहां मेने सोचा , एक वो जमाना था जब लोग गांवों की आबो - हवा को पसंद करते थे और गाँव के जीवन की तुलना सवर्ग सुख से करते थे.

मगर आज ? सब कुछ जैसे अतीत में कहीं दफ़न हो गया हो सदा के लिए कभी कभी सोचता हूँ
इसके लिए कोन जिम्मेदार है ? आज या गुजरा हुआ कल ? या फिर ये आने वाले कल का परिवर्तन है | किसी ने कहा की जीवन के लिए परिवर्तन जरुरी है अन्यथा हमें भी डायनासोर की तरह याद किया जायेगा फिर सोचता हूँ की आखिर कितना परिवर्तन होना चाहिए और कितने समय में ? धीरे धीरे या अचानक ? कुछ पल के लिए ही सही मगर क्या हम , ३० या ५० साल पहले के कुछ क्षण अपने आज के  जीवन से चुराकर जी सकते हैं ? काश ऐसा होता

कितना अच्छा होता अगर ये जीवन एक कंप्यूटर Wordpad की तरह होता और हम अपने हिसाब
से कोई भी लाइन (पल) इधर से उधर कर लेते , किसी भी पल अपना मनचाहा पल जीने के  लिए उस लाइन में कर्सर (cursor ) ले जाते और .......खैर में भी कहां से कहाँ पहुच  गया , पानी से जीवन की बाते करने लगा . वैसे देखा जाये तो पानी ही जीवन है


हाँ तो में गाँव में पानी का रोना रो रहा था , इसे रोना ही कहा जायेगा कयोंकि आज कल पानी रोने से ही आता है "आँखों में" मेरे गाँव में हर इंसान कुछ भी कर सकता है सिवाए पानी का जुगाड़ करने के बेचारा पानी लाये भी तो कहाँ से ? जमीन का पानी सरकार ने निकाल निकाल  कर आस पास के गांवो में सप्लाई कर दिया, पिछले २० सालों से जमीन का दोहन लगातार हो रहा है मगर किसी को चिंता नहीं आज जब पानी सर से ऊपर निकलने की जगह पैर के नीचे  से निकल गया तो होश आया है

हमें अपने बुजर्गो से जो मिला हम उसी को खाने में लग गए बशर्ते उसे और बढाने के अब हम अपनी आने वाली पीढी को क्या देंगे ? प्रदुषण , भूख-प्यास , सीमित संसाधन बस माना की हमसे पहले वाली पीढी का जीवन स्तर इतना ऊँचा नहीं था मगर जीवन स्वस्थ और लम्बा तो था , आज की तरह दुनिया भर की बीमारी तो नहीं थी जीवन कम हो मगर स्वस्थ हो तो अच्छा होता है ना की बीमार और घुट घुट कर जीने वाला अंतहीन जीवन...

"विक्रम"

Saturday, 5 February 2011

मेरा गाँव मेरे लोग (गुगलवा - बास किरतान)




( ०६-०२-२०११ - बैंगलोर )

मुझे अपने गाँव से बहुत प्रेम है.मगर मेने अपने गाँव में बीते कुछ बरसो में बहुत से परिवर्तन देखे हैंI में जब आज से करीब २० साल पहले वाले गाँव की तुलना आज के गाँव से करता हूँ तो बहुत दुःख होता है I इन २० बरसो में बहुत कुछ खो दिया मेरे गाँव ने ये ठीक है की के दोर में बहुत सी सुविधाए है ,नई टेक्नोलोजी का असर देखने को मिल रहा है. आज का युवा उसका पूरा उपयोग कर रह है , भले ही उस असरकुछ भी हो रहा हो आज से २० साल पहले पीने का पानी भी २०० फीट निचे से अपने हाथो से खींच कर पीना पड़ता था. बिजली ,पानी,सड़क जैसी बुनियादी चीजे तो कभी खवाबो में भी नहीं थी, मगर शुक्र है निक्कमी सरकार को जो हमें इन सब सुविधाओं के दर्शन तो करवाए भले ही नाम मात्र के सही .



कहने को ये सब है मेरे गाँव, में मगर सिर्फ नाम के लिए और कागजो में दिखाने को , जैसे लाइट है मगर जलती नहीं ,पानी के वितरण की बहुत बड़ी परियोजना है जो आस पास के १५ से अधिक गाँव को पानी सप्लाई करती है (कभी कभी) ,सड़के है मगर कहाँ से शुरु कहाँ पे ख़तम पता ही नहीं , किसी भी राजमार्ग से नहीं मिलती. सरकारी स्कूल है जहाँ बच्चे सिर्फ समय बिताने को जाते हैं,माता पिता आज कल अपने बच्चो को वहां नहीं भेजकर निजी स्कूलों में भेजते है निजी स्कूलों में मास्टर भी गाँव के सनातक युवा है जिनको कोई रोजगार नहीं मिला वो इस व्यवसाय में आ गए.



इन सब के बावजूद भी गाँव के लोगो के चेहरे पे शिकन तक नहीं आती जब कभी चुनाव हों तब देखो तो हर कोई इतने जी-जान अपने अपने नेता के लिए २४ घंटे प्रचार करता फिरेगा , अपने चहेते नेता के लिए दिन रात एक कर देगा , मगर कभी अपने चहते नेता को बिजली पानी जैसी तुछ चीजों के लिए नहीं कहेगा भूखा प्यासा उसके लिए मारा मारा फिरेगा मगर उफ़ तक नहीं करेगा ऐसा है मेरे गाँव का मतदाता बेचारा



अपने नेता के लिए अपने ही परिवार और अपने ही दोस्तों से टकरा जायेगा मगर नेताजी को चुनाव जीता कर ही दम लेगा जीत के बाद नेता अपने रास्ते चला जाता है और मेरे गाँव का मतदाता फिर अपने रोजाना के कामो में लग जाता है , जैसे पानी की तलाश , पेट भरने के लिए नेता ( सरकार ) द्वारा चलाये जा रहे राहत योजनावों के चक्कर आदि आदि ..चुनाव प्रचार के दोरान जिन अपनों से दुश्मनी की उनके ,सामने शर्मिंदा होकर रहता है ,मगर समय के साथ वो कडवाहट भी चली जाती है और धीरे धीरे लोग, नेता और चुनाव को भूल जाते हैं अगले चुनाव में याद रखने के लिए यही चक्कर चलता रहता है मेरे गाँव के लोगों और नेता लोगो के बीच जो कभी ख़तम नहीं होता



एक और बीमारी से ग्रस्त है मेरे गाँव के कुछ लोग और वो है "जातिवाद",जो मेरे गाँव की संस्कृति और सभ्यता को घुन की तरह खाए जा रही है, कभी साथ बैठने वाले आज अलग अलग समूहों में बैठे पाए जाते हैं ,और उनकी बातों का विषय होता है, "जातिवाद", इसके साथ ही शराब का योगदान भी बहुत रहा है मेरे गाँव को इस मुकाम तक पहुचाने में आज जब कभी गाँव जाता हूँ तो १५ से २५ साल के सभी युवा दिन ढलने के साथ ही अपने आप को शराब के हवाले कर देते हैं .( लगातार....)



"विक्रम"



शादी-विवाह और मैरिज ।

आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...