Saturday, 21 May 2011

आमंत्रण




मैने सहस्त्रो आमन्त्रण भेजे तुम्हे
आखिर कब आओगे ?

पिछली बारिश में , भीगते हुए राह देखता रहा
बारिस आई और गई , और मन तरसता रहा
रातभर झींगुरों के ताने और कीटो की चिकोटी
अपने दिल को तुम्हारा समझ कही खरी खोटी

पोष की सर्द रातों में रातभर आँखे बिछाई मैने
तब तेरे इन्तजार में ढेरों नींद गँवाई मैने
पत्थर बन चूका हूँ सर्द हवा के थपेड़ों से
और अब ओस बन लटक रह हूँ पेड़ो से

गर्मी की तपती दुपहरी में भी तेरा रस्ता देखा है
मगर हरबार की तरह निष्ठुर को हँसता देखा है
हर मोसम में जला है दिल तेरे इन्तजार में
विश्वास उठ रहा है अब यार-ये-इकरार में
मगर .....
आमन्त्रण भेजता रहूँगा .....मरते दम तक ....
क्योंकि....अब भी....
सवाल वही है ...
आखिर कब आओगे ?


"विक्रम"

दो शब्द






तुम से कुछ कह ना पाने का गम ,
जीवन के हर मोड़ पे कचोटता है मुझे ..
क्योंकि ... वो वक़्त हमारा नहीं था

जिन्दगी की दोड़ में जिन्दगी को ही पिछे छोड़ दिया मेने
ना जाने किस डर से तेरा दामन तनहा छोड़ दिया !

कुछ ला ना सका सिवा तेरी यादो के , चुरा के तुमसे
आज तन्हाइयों में उन्हें ही मरहम बना लेता हूँ !

कभी अकेले में उन्ही यादो के आलिंगन में रोते हैं
बस उस दरमियाँ हम कुछ और नजदीक होते हैं !

ना जाने कितना दखल है मेरा, तेरे ख्वाबों में
तुम तो मेरे खाव्बों को अपनी जागीर समझ बैठी !

यूँ तो तुम्हारा मेरे दिल की अँधेरी गहराइयों तक हक है
मगर अक्सर तुम और गहराइयों में उतर जाती हो , उफ !

चलो हम ऐसे ही रहें इस सूखे से जीवन में मगर ...
कल हम होंगे अपने सपनो के साथ एक साथ ..

और कहेगें एक दूजे से , वो सब कुछ जो ...हम
तब ना कह सके थे , किसी डर से हम.. क्योंकि तब
वक्त ने शब्द छीन लिए थे हमसे , मगर .... कल ...
कल हम वक़्त के हलक से वो शब्द निकाल लेंगे ..क्योंकि
तब वक़्त हमारा होगा ...


"विक्रम"

Saturday, 12 March 2011

गुगलवा बनाम गूगल


M Village Street





गुगलवा बनाम गूगल (व्यंग्य)
(Googlwa vs Google )

मुझे लगता है गूगल ने अपना नाम मेरे गाँव से लिया है क्योंकि ये तो जाहिर है की मेरा गाँव कम से कम २०० साल पुराना तो है और इस से ये साबित होता है की मेरे गाँव का नाम गूगल से नहीं पड़ा. गूगल का जन्म 1995 में हुआ था और मेरे दादा जी का जन्म 1895 को उसी गाँव में गूगल से 100 साल पहले हुआ था.

अगर आप गूगल को भोजपुरी (यूपी बिहारी )भाषा में Pronounce( उच्चारित ) करें तो वो "गूगल वा" है , यानि कुछ न कुछ तो है मेरे गाँव के नाम में वरना ऐसे ही उसका नाम ये नहीं होता | मेने कुछ रिसर्च किया तो लगा की दोनों में कुछ  विपरीत   समानता तो है जैसे :-

1. गूगल को पूरी दुनिया जानती है - मेरे गाँव को कोई नहीं जानता
2 .लोग गूगल पे दुनिया भर की जानकरी खोजते हैं - मेरे गाँव के लोग अपने ही गाँव में
    पानी,बिजली ,सड़के अस्पताल खोजते हैं जो कभी नहीं मिलते |

आप को मेरे गाँव की जानकारी गूगल (गूगल वा ) पर नहीं मिलेगी इसीलिए में कुछ जानकारी देना चाहता हूँ .  मेरे गाँव में कुछ धना सेठ भी है, जो कभी कभी गाँव के कुएं या मंदिर की टूटी हुई दिवार ठीक करवा कर उसपे अपने नाम की प्लेट लटका देते हैं या कभी सरकारी स्कूल में कुछ टूट फूट ठीक करवा देते हैं और इसका ढिंढोरा पिटवाना कतई नहीं भूलते. एक धना सेठ पुराने गेट को तोड़कर नया गेट लगाते वक़्त उसपे अपना नाम जरुर लिखवा देता है |

में एक बात बताना भूल ही गया , स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल का गाँव भी मेरे गाँव के पास में हैं और उस गाँव की हालत भी मेरे गाँव से अच्छी नहीं है | वैसे ये सब तो आज कल सभी गावों में होता है फिर में अपने गाँव को क्योंइसमें घसीट रहा हूँ ? वो इसीलिए क्योंकि बात मेरे गाँव और गूगल की चल रही है और दोनों आज के ज़माने में अपनी अपनीजगह पे जमे हुए हैं ,बे-खोफ के-धडक .एक दुनिया को खोज रहा है और दूसरा अपने आप को दुनिया में खोज रहा है |कोई है इनकी टक्कर का ? (हो सकता है गूगल की नज़र मेरे गाँव पे पड़े और उसकी (मेरे गाँव)  की  किस्मत चमक जाये )

"विक्रम" 13 -03 -2011

Friday, 18 February 2011

परिवर्तन

( Bangalore 19th Feb'2011)


आज वो दोनों एक दुसरे से नजरें चुराकर निकलते हैं और नहीं चाहते की कही आमना सामना हो |
वैसे दोनों सगे भाई हैं मगर समय के अनुसार आज एक दुसरे के प्रतिदवंदी बन गए| कही किसी जगह अगर एक का जिक्र आता है तो दूसरा ऊठ कर चल देता है यानि उसके बारे में कुछ सुनना
भी पसंद नहीं |  ये उन दोनों की कहानी नहीं घर घर की कहानी है और देखा जाये तो ये प्रकृति का नियम है जो आज भी एक रहस्य बना हुवा है की सही में प्रकृति का नियम है या मनुष्य ने बनाकर प्रकृति के नाम लगा दिया |

कभी दोनों भाई साथ खेलते थे , एक दुसरे का बहुत ख्याल रखते थे , उन की एक छोटी बहन थी वो भी अपने दोनों भाईयों के साथ ही रहती थी , साथ रहना, खाना,पीना खेलना सब कुछ एक दुसरे के बिना नहीं करते थे ये उन दिनों की बात है जब वो बच्चे थे मगर आज जवान होने के साथ अपनापन भूल गये | अब कोई इसको बचपना कहेगा या उस बचपन को बचपना कहे ,ये में तो क्या कोई भी नहीं समझ पाएगा | क्या इंसान जब बच्चा होता है तब ज्यादा समझदार होता है या जवान होने के बाद समझदार होता है |

कभी खेलते खेलते एक ही बिस्तर पर तीनो भाई-बहन थक कर सो जाया करते थे और सुबह के आलस में ए क दुसरे से चिपक कर सोने और उठने की कोशिश करते रहते थे ,कोई सोना तो कोई
उठाना चाहता था और इसी तरह फिर से वो खेलने लग जाते |

फिर आज ऐसा क्यों ? किसने उन सभी के बीच में ये अलगाववाद की दिवार खींच दी ? क्यों एक दुसरे से बच कर निकलना चाहते हैं , क्यों उनके दरमियाँ ये इतने फासले हुए और निरंतर बढते ही जा रहे हों | अक्सर हम कहते हैं की दुनिया ने उनके बीच दिवार खड़ी करदी , मगर क्या सचमुच दुनिया ने ऐसा क्या ? नहीं , ये उन लोगो ने खुद क्या , वो जवान होने के साथ साथ अपना विवेक खोते गये और साथ रहने की बजाय अकेले रहना पसंद करने लेगे | बस फर्क इतना है बचपन में खिलोने और मिठाई के लिए लड़ते थे और आज घर और जमीन के लिए |

दोनों अवस्थाओं में हरकतें एक जैसी हैं | तो क्या लड़ना झगड़ना इंसानी फितरत है ? अगर हाँ तो दोनों अवस्थावों के दुवंद में इतना फर्क क्यों ? क्यों आज भी वैसे की झगडा करके कुछ ही पलों में भूल नहीं जाते ?क्यों रंजिश पाल लेता है इंसान अपनों के साथ

" दुश्मनी करो तो जम कर करो मगर ! ये गुंजाइश हो
कि , जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिंदा ना हों !

"विक्रम"

Friday, 11 February 2011

पानी रे पानी ...!


१२-०२-२०११ ( बैंगलोर)

अभी कल ही एक दोस्त का फ़ोन आया बोला यार इधर (गाँव) में तो पिछले १५ दिन से पानी नहीं  आया बहूत परेशानी है , तुम लोग अच्छा हो जो शहर में रहते हो बिजली,पानी की समस्या तो नहीं
होती वहां मेने सोचा , एक वो जमाना था जब लोग गांवों की आबो - हवा को पसंद करते थे और गाँव के जीवन की तुलना सवर्ग सुख से करते थे.

मगर आज ? सब कुछ जैसे अतीत में कहीं दफ़न हो गया हो सदा के लिए कभी कभी सोचता हूँ
इसके लिए कोन जिम्मेदार है ? आज या गुजरा हुआ कल ? या फिर ये आने वाले कल का परिवर्तन है | किसी ने कहा की जीवन के लिए परिवर्तन जरुरी है अन्यथा हमें भी डायनासोर की तरह याद किया जायेगा फिर सोचता हूँ की आखिर कितना परिवर्तन होना चाहिए और कितने समय में ? धीरे धीरे या अचानक ? कुछ पल के लिए ही सही मगर क्या हम , ३० या ५० साल पहले के कुछ क्षण अपने आज के  जीवन से चुराकर जी सकते हैं ? काश ऐसा होता

कितना अच्छा होता अगर ये जीवन एक कंप्यूटर Wordpad की तरह होता और हम अपने हिसाब
से कोई भी लाइन (पल) इधर से उधर कर लेते , किसी भी पल अपना मनचाहा पल जीने के  लिए उस लाइन में कर्सर (cursor ) ले जाते और .......खैर में भी कहां से कहाँ पहुच  गया , पानी से जीवन की बाते करने लगा . वैसे देखा जाये तो पानी ही जीवन है


हाँ तो में गाँव में पानी का रोना रो रहा था , इसे रोना ही कहा जायेगा कयोंकि आज कल पानी रोने से ही आता है "आँखों में" मेरे गाँव में हर इंसान कुछ भी कर सकता है सिवाए पानी का जुगाड़ करने के बेचारा पानी लाये भी तो कहाँ से ? जमीन का पानी सरकार ने निकाल निकाल  कर आस पास के गांवो में सप्लाई कर दिया, पिछले २० सालों से जमीन का दोहन लगातार हो रहा है मगर किसी को चिंता नहीं आज जब पानी सर से ऊपर निकलने की जगह पैर के नीचे  से निकल गया तो होश आया है

हमें अपने बुजर्गो से जो मिला हम उसी को खाने में लग गए बशर्ते उसे और बढाने के अब हम अपनी आने वाली पीढी को क्या देंगे ? प्रदुषण , भूख-प्यास , सीमित संसाधन बस माना की हमसे पहले वाली पीढी का जीवन स्तर इतना ऊँचा नहीं था मगर जीवन स्वस्थ और लम्बा तो था , आज की तरह दुनिया भर की बीमारी तो नहीं थी जीवन कम हो मगर स्वस्थ हो तो अच्छा होता है ना की बीमार और घुट घुट कर जीने वाला अंतहीन जीवन...

"विक्रम"

Saturday, 5 February 2011

मेरा गाँव मेरे लोग (गुगलवा - बास किरतान)




( ०६-०२-२०११ - बैंगलोर )

मुझे अपने गाँव से बहुत प्रेम है.मगर मेने अपने गाँव में बीते कुछ बरसो में बहुत से परिवर्तन देखे हैंI में जब आज से करीब २० साल पहले वाले गाँव की तुलना आज के गाँव से करता हूँ तो बहुत दुःख होता है I इन २० बरसो में बहुत कुछ खो दिया मेरे गाँव ने ये ठीक है की के दोर में बहुत सी सुविधाए है ,नई टेक्नोलोजी का असर देखने को मिल रहा है. आज का युवा उसका पूरा उपयोग कर रह है , भले ही उस असरकुछ भी हो रहा हो आज से २० साल पहले पीने का पानी भी २०० फीट निचे से अपने हाथो से खींच कर पीना पड़ता था. बिजली ,पानी,सड़क जैसी बुनियादी चीजे तो कभी खवाबो में भी नहीं थी, मगर शुक्र है निक्कमी सरकार को जो हमें इन सब सुविधाओं के दर्शन तो करवाए भले ही नाम मात्र के सही .



कहने को ये सब है मेरे गाँव, में मगर सिर्फ नाम के लिए और कागजो में दिखाने को , जैसे लाइट है मगर जलती नहीं ,पानी के वितरण की बहुत बड़ी परियोजना है जो आस पास के १५ से अधिक गाँव को पानी सप्लाई करती है (कभी कभी) ,सड़के है मगर कहाँ से शुरु कहाँ पे ख़तम पता ही नहीं , किसी भी राजमार्ग से नहीं मिलती. सरकारी स्कूल है जहाँ बच्चे सिर्फ समय बिताने को जाते हैं,माता पिता आज कल अपने बच्चो को वहां नहीं भेजकर निजी स्कूलों में भेजते है निजी स्कूलों में मास्टर भी गाँव के सनातक युवा है जिनको कोई रोजगार नहीं मिला वो इस व्यवसाय में आ गए.



इन सब के बावजूद भी गाँव के लोगो के चेहरे पे शिकन तक नहीं आती जब कभी चुनाव हों तब देखो तो हर कोई इतने जी-जान अपने अपने नेता के लिए २४ घंटे प्रचार करता फिरेगा , अपने चहेते नेता के लिए दिन रात एक कर देगा , मगर कभी अपने चहते नेता को बिजली पानी जैसी तुछ चीजों के लिए नहीं कहेगा भूखा प्यासा उसके लिए मारा मारा फिरेगा मगर उफ़ तक नहीं करेगा ऐसा है मेरे गाँव का मतदाता बेचारा



अपने नेता के लिए अपने ही परिवार और अपने ही दोस्तों से टकरा जायेगा मगर नेताजी को चुनाव जीता कर ही दम लेगा जीत के बाद नेता अपने रास्ते चला जाता है और मेरे गाँव का मतदाता फिर अपने रोजाना के कामो में लग जाता है , जैसे पानी की तलाश , पेट भरने के लिए नेता ( सरकार ) द्वारा चलाये जा रहे राहत योजनावों के चक्कर आदि आदि ..चुनाव प्रचार के दोरान जिन अपनों से दुश्मनी की उनके ,सामने शर्मिंदा होकर रहता है ,मगर समय के साथ वो कडवाहट भी चली जाती है और धीरे धीरे लोग, नेता और चुनाव को भूल जाते हैं अगले चुनाव में याद रखने के लिए यही चक्कर चलता रहता है मेरे गाँव के लोगों और नेता लोगो के बीच जो कभी ख़तम नहीं होता



एक और बीमारी से ग्रस्त है मेरे गाँव के कुछ लोग और वो है "जातिवाद",जो मेरे गाँव की संस्कृति और सभ्यता को घुन की तरह खाए जा रही है, कभी साथ बैठने वाले आज अलग अलग समूहों में बैठे पाए जाते हैं ,और उनकी बातों का विषय होता है, "जातिवाद", इसके साथ ही शराब का योगदान भी बहुत रहा है मेरे गाँव को इस मुकाम तक पहुचाने में आज जब कभी गाँव जाता हूँ तो १५ से २५ साल के सभी युवा दिन ढलने के साथ ही अपने आप को शराब के हवाले कर देते हैं .( लगातार....)



"विक्रम"



Sunday, 26 April 2009

My Village - Gugalwa ( Guglwa Kirtan)








My village is situated in Tehshil Sadulpur of District Churu of Rajasthan (India). It name is Gugalwa (Guglwa Kirtan). It is 3 km from Rampura Beri or 23 Kms from PILANI and 1 kms from Railway Station ( Guglwa-Kirtan) . Pilani is small town, situated on Sadulpur-Sikar-Jhujnjhunu national highway. It is famous for BITS. About my village, it is not associated with any historical event; however it is unique in many ways. It is important to me because my lots of memories are associated with this.

This is a small village with 300-350 houses, which includes the 40 houses of (Rajputs) and 30 houses of Jat's and rest houses from the others castes. Though it is small village, but it is unique in its structure. Here everybody is dependable on each other. Most of the lands are owned by the Rajput's,Jat's (Upper Casts) approximately about 80%. . In this unique way all castes are totally dependable on each other. Nobody can survive without the help of other. Second unique thing about my village is its water system. This area is prone for water shortage. But the elders of village have very wisely constructed a small Water Supply House and its supply from 3 to 20 km away to the other villages. This supply system was made by the government.

People talks from km away can be heard. In cities, we will ever get this opportunity. Here one can hear nature talking to him and see lot of miracles of nature. I invite people to explore the beauty of my village and Rajasthan . You will really like this for your life.
Rajput's

शादी-विवाह और मैरिज ।

आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...