Wednesday, 11 January 2017

देवड़ा चौहान

प्रसिद्ध चौहान वंश की चौबीस शाखाएँ हैं, उनमें एक शाखा का नाम देवड़ा है। इस शाखा के चौहानों का राजस्थान में सिरोही पर राज्य था। अपनी अनेक विशेषताओं और ख्यातियों का धनी आबू पर्वत सिरोही रियासत का ही अंगभूत था। आबूगिरि पर स्थापत्य कला के नयनाभिराम जैन मन्दिर हैं। सिरोही राज्य का क्षेत्रफल 1964 वर्ग मील था।
 
देवड़ों की उत्पति-इतिहास के अवलोकन से ऐसे तथ्य प्रकट होते हैं कि देवड़ा राजपूतों की दो शाखाएँ रही हैं। राजपूतों में एक ही नाम की एक से अधिक शाखाएँ मिलती हैं। जैसे कछवाहों में चौमू तथा सामोद आदि के ठाकुरों की नाथावत शाखा है। इनके अतिरिक्त इस शाखा से भी प्राचीन कछवाहों में इसी नाम की एक ओर शाखा है। इसी प्रकार कछवाहों के अलावा सोलंकियों में भी नाथावत नाम की एक शाखा है।
 
सिरोही की देवड़ा शाखा से भिन्न देवड़ा शाखा का प्रादुर्भाव सांभर के चौहान शासक के देवराज नाम के एक पुत्र से हुआ था। इस शाखा का आबूगिरि के वि.सं.1225और 1229 के प्राप्त दो शिलालेखों में वर्णन है। समयावधि के पश्चात् चौहानों की यह प्रथम शाखा नाम शेष हो गई।
 
वर्तमान देवड़ा शाखा का निकास चौहानों की सोनगिरा शाखा से हुआ है। जालौर के शासक भानसिंह अर्थात् भानीजी के एक पुत्र का नाम देवराज था। उसकी संतति वाले देवड़ा कहलाये। इस देवराज के पुत्र विजयराज ने मुसलमानों को पराजित कर मणादर (बड़गांव) पर विजय प्राप्त की। जालौर पर अलाउद्दीन खिलजी के इतिहास प्रसिद्ध प्रथम आक्रमण के समय जालौर के शासक कान्हड़देव सोनगिरा की सहायतार्थ ये देवड़ा शासक गया था। इस विजयराज के पौत्र राव लुम्भा ने परमारों से चन्द्रवती विजय कर वहाँ पर अपनी राजधानी स्थापित की थी। लुम्भा के छोटे भाई लूला के वंशजों का जीणोंद्धार कराया था और 1320ई. में उसके एक ग्राम भेंट किया था। लुम्भा की कुछ पीढ़ियों के बाद शिवमाल हुआ। इसने मुसलमानों । द्वारा चन्द्रावती ध्वस्त कर देने पर पहाड़ी पर एक दुर्ग का निर्माण कर उसका अपने नाम पर शिवपुर नगर नाम रखा ।
 
ई. 1405 वि. में बसाया गया वह नगर वर्तमान सिरोही नगर के पूर्व में निर्जन और ध्वंसित अवस्था में पड़ा है। शिवमाल के पुत्र सहसमल ने उक्त नगर में पानी के अभाव के कारण 20 अप्रेल 1425 ई. में वर्तमान सिरोही नगर बसाया तथा इसे अपनी राजधानी का गौरव प्रदान किया। इसके समसामयिक मेवाड़ के प्रतापी महाराणा कुम्भा ने आबू पर अधिकार कर वहाँ 1425 ई. में अचलगढ़ नामक दुर्ग और अचलेश्वर महादेव का देवालय बनाया था। सहसमल के पुत्र राव लाखा के समय में मालवा और गुजरात के मुस्लिम शासकों ने मिलकर मेवाड़ पर आक्रमण किया। महाराणा कुम्भा ने उनका सामना करने के लिए अपनी समस्त सेना को एकत्र किया इसलिए आबू की रक्षार्थ सेना मेवाड़ चली गई। इस अवसर का लाभ उठा कर राव लाखा ने आबू पर अधिकार कर लिया। लाखा के पुत्र राव जगमाल के समय में जब दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने मेवाड़ के महाराणा रायमल पर आक्रमण किया तब इस युद्ध में राव जगमाल देवड़ा महाराणा की मदद पर गया था। इस संग्राम में राजपूतों की विजय हुई। इस अवधि में जालौर पर पठानों का आधिपत्य था और तब वहाँ का शासक मजदी खाँ था। उसने सिरोही पर हमला किया। राव जगमाल ने उसे परास्त कर बंदी बना लिया। फिर मजदी खाँ से नौ लाख रुपये दण्डस्वरूप लेकर उसे कारागार से मुक्त किया।
 
देवड़ों के कुलदेव सारणेश्वर महादेव हैं। सारणेश्वर का मन्दिर सिरोही से तीन मील की दूरी पर पहाड़ की तलहटी में है। वह चारों और से परकोटे से घिरा हुआ है। यह परकोटा मालवा के सुल्तान ने बनवाया था। वह कुष्ठ रोग से पीड़ित था। सारणेश्वर की मनौती से उसका कुष्ठ मिट गया था।
 
जगमाल के बाद उसका पुत्र अक्षयराज सिरोही की गद्दी पर बैठा। इस कालावधि में मुगल बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। महाराणा संग्रामसिंह प्रथम ने ई. 1527में खानवा के युद्धस्थल पर बाबर पर आक्रमण किया। उसमें राव अखैराज महाराणा के पक्ष में मुगलों से लड़ा था। राव अखैराज ने भी जालौर के महजूद खाँ से युद्ध किया था और उसे बन्दी बना लिया था। किन्तु राजपूतों की उदार नीति के कारण वह भेंट देकर छूट गया। अखैराज का पुत्र राव रायसिंह मेवाड़ के महाराणा विक्रमादित्य पर गुजरात के बहादुर शाह के आक्रमण करने पर मेवाड़ की सहायता पर चित्तौड़ गया था। बहादुरशाह के चित्तौड़ के इसी घेरे का प्रतिरोध करते हुए राव रायसिंह खेत रहा था। रायसिंह बड़ा वीर और उदार शासक था।
 
तत्पश्चात ई. 1571 में सिरोही के राज्यासन पर राव सुरतान देवड़ा बैठा। यह महाराणा प्रतापसिंह, राजा चन्द्रसेन की भाँति ही वीर, साहसी स्वातन्त्र्य-प्रेमी और देशभक्त था।
राव सुरतान गद्दी पर बैठा तब वह केवल 12 वर्ष की अल्पायु था। इसकी माता राणी झाली सती हुई थी। सुरतान छोटी उम्र का होते हुए भी कभी भी दिल्ली के मुगल बादशाह के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। राव सुरतान की अल्पावस्था का लाभ उठाकर सिरोही के प्रधान मन्त्री विजयराज (बीजा) देवड़ा ने (जिसके हाथ में पहिले से ही सिरोही का राज्य-प्रबन्धन चला आ रहा था।) उसने सिरोही पर अधिकार कर लिया। तब राव सुरतान सिरोही छोड़कर रामसींण चला गया। सिरोही के सामन्त सरदारों ने बीजा को अपदस्थ कर सुरतान को पुनः सिरोही की गद्दी सौंपी।
 
बादशाह अकबर ने ई. 1576 में सिरोही विजय करने के लिए सेना भेजी। राव सुरतान शाही अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। शाही सेना से सुरतान का युद्ध हुआ। इसमें बादशाही सेना की विजय हुई। सिरोही पर शाही सेना का अधिकार हो गया। इस पर सुरतान आबू के पहाड़ों पर चला गया और वहाँ से शाही सेना पर हमले करने लगा। शाही सेना का अधिकारी तरसुखाँ सिरोही पर सैयद हुसेन को नियुक्त कर दिल्ली लौट गया। मेवाड़ में महाराणा प्रतापसिंह और शाही सेना में युद्ध चल रहा था। राव सुरतान महाराणा की युद्ध-सहायता करता रहा। इसकी जानकारी मिलने पर बादशाह ने फिर नवीन सेना भेजी। ई. 1581 में राव सुरतान ने सिरोही पर आक्रमण करके सैयद हासिम को मार कर सिरोही को हस्तगत कर लिया। इसी समयावधि में शाही मनसबदार खान कला गुजरात जा रहा था। सिरोही के पास से गुजरते हुए उस पर राजपूतों ने धावा मार कर उसे सख्त घायल कर दिया था। इसका प्रतिशोध लेने के लिए शाही सेना सिरोही पर आयी। राव सिरोही छोड़कर पुनः आबू के पहाड़ों पर चला गया। पीछे 150 राजपूत योद्धाओं ने शाही सेना का सामना करके वीर गति प्राप्त की ।
 
बादशाह अकबर ने सैन्यबल से राव सुरतान पर काबू न पाने पर राजपूतों में फूट डालने की नीति अपनायी और महाराणा प्रतापसिंह के छोटे भाई महाराज जगमाल जहाजपुर वालों के पूर्वज को जो कि शाही मनसबदार तथा सिरोही के पूर्व राव मानसिंह का दामाद था उसको सिरोह राज्य जागीर में दे दिया। राव सुरतान ने भी सम्बन्ध के नाते सिरोही में रहने के लिए उसका विरोध नहीं किया। सुरतान राज महलों में रहता था और जगमाल अन्यत्र रहता था। इस पर जगमाल की राणी ने अपने पति से कहा कि मेरे रहते मेरे पिता के महलों में सुरतान कैसे रह सकता है? संयोगवश एक बार सुरतान सिरोही से बाहर गया हुआ था। इस अवसर पर जगमाल ने सिरोही के पूर्व प्रधान आमात्य विजयराज देवड़ा से सांठ-गांठ कर दोनों ने सम्मिलित रूप से राज प्रासाद पर आक्रमण किया। परन्तु महलों के प्रबन्ध पर नियत संग्रामसिंह सोलंकी और चारण दूदा आशिया ने उस हमले को विफल कर दिया। अतएव जगमाल सिरोही त्याग कर अकबर के पास आगरा चला गया।
 
दत्ताणी का प्रसिद्ध युद्ध  जगमाल राणावत ने बादशाह अकबर के पास जाकर राव सुरतान देवड़ा की शिकायत की इस पर अकबर ने राव चन्द्रसेन राठौड़ के पुत्र शाही मनसबदार राव रायसिंह राठौड़ सोजत के नेतृत्व में सिरोही पर एक मुगल सेना भेजी। उसके साथ दांतीवाड़ा के स्वामी कोलीसिंह तथा विजयराज देवड़ा भी था। बादशाह ने इस सेना में नियुक्त अपने अमीरों को खिल्लतें आदि देकर सम्मानित किया। यह सेना आगरा से प्रयाण कर सोजत में ठहरी। यहाँ कुछ समय व्यतीत कर राव रायसिंह ने अपने अन्य सरदारों को एकत्रित किया और युद्ध की तैयारी कर सिरोही पर कूच किया। मुगल सेना ने सीधा सिरोही पर आक्रमण न कर सिरोही के जागीरदारों पर हमले करने की योजना बनाई ताकि सरदार लोग अपने ठिकानों की रक्षार्थ चले जायेंगे। इस प्रकार सिरोही की सेना बिखर जायेगी। इस योजनानुसार विजयराज देवड़ा के सेनानायकत्व में भीतरोट पर सेना भेजी। इस आक्रमण के बावजूद भी सरदारों ने राव सुरतान का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रकार मुगल सेना की यह चाल सफल नहीं हुई। इस पर देवड़ा समरसिंह ने सुरतान से कहा कि अब देरी नहीं करनी चाहिए और तत्काल मुगल सेना पर हमला बोल देना चाहिए। तब सुरतान ने नक्कारा बजवा कर मुगल सेना पर धावा बोल दिया। यह युद्ध वि.सं. 1640 कार्तिक सुदि 11 ईस्वी 1583अक्टूबर 18 को दत्ताणी के मैदान में हुआ।
 
मुगल सेना ने अपनी हरावल में गज सेना को रखा। तोपों और बन्दूकों के गोले-गोलियों से धुआँधार वर्षा होने लगी। देवड़ों की सेना का संचालन स्वयं राव सुरतान कर रहे थे। वे केशर नामक घोड़ी पर सवार थे जिसका रंग भेंवर था। उनके साथ वीरवर समरसिंह देवड़ा था। राव सुरतान तीव्र वेग से आक्रमण कर मुगल सेना में घुस गया। इस प्रचण्ड आक्रमण से शाही हाथी सेना मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई। राव रायसिंह हाथी पर सवार था। सुरतान ने अपनी घोड़ी केशर को हाथी पर कुदाया घोड़ी ने अपने आगे के दोनों पैर हाथी के वक्षस्थल पर जमाये। राव सुरतान ने राव रायसिंह पर तलवार से प्रहार किया। राव रायसिंह इस प्रकार से मारे गए। इनके साथ ही महाराज जगमाल राणावत व कोलीसिंह भी काम आये।
 
महाराव सुरतान का प्रमुख सरदार समरसिंह देवड़ा घोर समरकर खेत रहा। राव रायसिंह के बीस सरदार इस युद्ध में काम आये। मुगल सेना की पूर्णतया हार हुई। राव रायसिंह,महाराज जगमाल आदि के नगारे, निशान तथा सैनिक सामान सुरतान के हाथ आया।
 
दत्ताणी के युद्ध के बाद जब युद्ध क्षेत्र को सम्भाल कर घायलों को चिकित्सा के लिए उठा रहे थे और मरणासन्न घायलों को दूध पिला रहे थे उस समय राजस्थान का प्रसिद्ध चारण कवि दुरसा आढ़ा जो राव रायसिंह के साथ था, तथा सख्त घायल होकर गिरा था, उसे भी राजपूत समझ कर दूध पिलाने लगे तब उसने अपने आपको चारण बताया।
 
समरसिंह ने राव (सुरतान) को (धरती) राज्य डूंगरोत शाखा वाले देवड़ों को यश, अपनी संतति पुत्र-पोत्रों को विरुद और शत्रु पक्ष को पराजय की हानि प्रदान की। इस प्रकार वह वीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त कर अपने जीवन को सफल कर स्वर्ग गया। तब दुरसा का इलाज करवाया गया। वह स्वस्थ हो गया। वह उच्च श्रेणी का कवि था। सत्यवादिता और स्वाभिमान के लिए उसकी प्रसिद्धि थी। अकबर के दरबार में उसका सम्मान था। वहाँ भी वह सत्य बोलने और सत्य काव्य-पाठ करन के लिए प्रसिद्ध था। इसका जन्म मारवाड़ के पांचेटिया गांव में 1592 वि. में हुआ। यह राव रायसिंह की सेना में था। राव सुरतान ने उसे अपने पास रखा और वि.सं. 1663 में उसे करोड़ पसाव तथा पेशवा नामक गाँव दिया। उसने दत्ताणी के युद्ध पर 'राव सुरताणरा झूलणा' नामक काव्य लिखा था। दुरसा को मेवाड़ और जोधपुर राज्य से भी कई गाँव मिले थे। ई. 1712 में 120 वर्ष की दीर्घ आयु प्राप्त कर वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।
 
राव रायसिंह ने धरती की तीन बार वन्दना कर जगमाल को सिरोही दिलाने की प्रतिज्ञा के साथ प्रमाण किया। दरबार में उपस्थित हिन्दू और तुकों ने उसके साहस की सराहना की।
 
इस प्रकार चित्तौड़ के राणावत जगमाल और सोजत के राव रायसिंह सहित शाही सेना को धराशायी कर राव सुरतान ने विजय की दुन्दुभी बजायी।
 
दत्ताणी की रणभूमि में विजय प्राप्त कर राव सुरतान ने अपने वीरवर सामन्त सिंह देवड़ा को विजयराज देवड़ा पर भेजा जो दत्ताणी के युद्ध से पूर्व शाही सेना के एक दल को लेकर भीतरोट की और गया हुआ था,उसके विरुद्ध भेजा। दोनों पक्षों में मुकाबिला होने पर विजयराज का भाई धनराज देवड़ा मारा गया और विजयराज रण छोड़ कर भाग गया।
 
दत्ताणी में शाही सेना की भयंकर हार की जब बादशाह अकबर को खबर मिली तो वह बड़ा क्रोधित हुआ और जामबेग को एक सेना देकर राव सुरतान के विरुद्ध रवाना किया। जामबेग की सहायतार्थ जोधपुर के मोटे राजा उदयसिंह को भी नियुक्त किया। इस सेना के सिरोही में पहुंचने पर सुरतान सिरोही छोड़कर अपनी सेना सहित आबू के पहाड़ों पर चला गया। मुगल सेना काफी समय तक सिरोही में जमी रही। पर पहाड़ों पर चढ़कर लड़ने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। तब जामबेग ने सुरतान के साथ समझौता करने का तय किया। अतएव सं. 1645 ई. 1588 में मोटा राजा उदयसिंह के सरदार बगड़ी के ठाकुर वैरीशाल को जो सुरतान का सम्बन्धी भी था के द्वारा संधि की बात चलायी। उदयसिंह के वचन पर महाराव पता (प्रताप सिंह) देवड़ा हम्मीर और बीदा आदि को बैरीशाल के साथ मुगल सेना में भेजा उन्हें भेजते समय सुरतान ने बैरीशाल को कहा कि-यह लोग मेरे कलेजे के टुकड़े हैं जिन्हें आपके साथ भेज रहा हूं। इस पर बैरीशाल ने कहा कि-इन्हें वापस नहीं पहुँचाऊँगा तो मेरा कलेजा दे दूंगा। देवड़ा सरदारों के शाही शिविर में पहुँचते ही जामबेग ने धोखे से उन्हें मार डाला। इस विश्वासघात पर बैरीशाल आग बबूला हो उठा और उसने मोटे राजा उदयसिंह के सामने ही अपने पाट में कटार घोंप कर अपने सेवक को कहा कि मेरा कलेजा राव सुरतान को दे आना। इस प्रकार बैरीशाल ने अपना प्राणान्त कर राजपूत के वचन पालन के आदर्श का पालन किया ।
 
इसके बाद जामबेग और विजयराज देवड़ा ने आबू पर चढ़ाई की ओर वासथानजी की ओर से पहाड़ पर चढने लगे। इसकी खबर मिलते ही राव सुरतान सेना लेकर उनके मुकाबिले पर पहुँचा। युद्ध में सुरतान के सरदार सांगा (संग्रामसिंह) सोलंकी के हाथ से स्वामी द्रोही विजयराज देवड़ा मारा गया और जामबेग हार कर पीछे भागा। इस प्रकार शाही सेनानायक निराश होकर कल्ला (कल्याण) देवड़ा को सिरोही देकर दिल्ली लौट गया। शाही सेना के कूच करते ही सुरतान पहाड़ों से उतर कर सिरोही पर अधिकार करने चला। यह सुनकर कल्ला देवड़ा सिरोही छोड़कर भाग गया। सुरतान का सिरोही पर वापस अधिकार हो गया।
तदनंतर अकबर ने सिरोही पर दो तीन बार पुनः सेनाएं भेजी परन्तु वे सुरतान को परास्त न कर सकी। महाराव सुरतान की आश्विन कृष्ण सं. 1767 ई. 1610 में 51 वर्ष की आयु में मृत्यु हुई। उसने 51 वर्ष में 52 युद्ध किये थे।
 
महाराव सुरतान विपत्तिकाल में महाराणा प्रतापसिंह को भी सिरोही भू भाग के पहाड़ों में रखा था। जोधपुर के राजा चन्द्रसेन राठौड़ को भी बादशाह अकबर की सेना द्वारा मारवाड़  से खदेड़ने पर एक वर्ष तक उसे सिरोही में रखा था। महाराणा प्रतापसिंह से इनकी पूर्ण मैत्री थी। महाराणा ने अपने पुत्र महाराज कुमार अमरसिंह की कन्या राव सुरतान को विवाही थी। इस सम्बन्ध का महाराणा के भाई सगर ने बड़ा विरोध किया था। कारण इनके भाई जगमाल को युद्ध में सुरतान ने मारा था। महाराणा ने सगर की इस आपत्ति पर कोई ध्यान नहीं दिया।
 
राव सुरतान जैसा उद्भट वीर था दानवीर भी था। उन्होंने चारणों, ब्राह्मणों, रावों आदि को 84 ग्राम दान दिये थे। लगभग सिरोही राज्य के प्रत्येक गाँव में दान प्रदत्त उदक मिलती है।
राव सुरतान ऐसा वीर तथा उदार था।
 
राव सुरतान के पौत्र राव अखैराज ने शाहजहाँ के पुत्रों के उताराधिकार के युद्ध में शाहजादे दाराशिकोह का पक्ष लिया था। अखैराज के पौत्र राव वैरीशाल के समय में महाराजा जसवन्त सिंह के अफगानिस्तान में निधन होने पर राव अखैराज की पुत्री आनन्द कुंवर जो जसवन्त सिंह की महारानी थी,सिरोही आ गई थी। दुर्गादास राठौड़ आदि जब बालक अजीतसिंह को लेकर सिरोही ही आये थे। राव वैरीशाल की भुआ और बालक महाराजा अजीतसिंह की विमाता आनंद कुंवर के कारण ही अजीतसिंह को गुप्त रूप से दिल्ली से निकाल कर मुकन्द दास खींची वगैरह ने सिरोही में जगदेव पुरोहित की स्त्री के लालन-पालन में कालन्द्री गांव में रहने का प्रबन्ध किया। जगदेव की स्त्री ग्राम के बाहर एक पहाड़ी पर स्थित मन्दिर में अजीतसिंह को रखती थी और पहाड़ पर जाने के मार्ग पर मुकन्ददास खींची सन्यासी के भेष में सुरक्षार्थ रहता था। वह धूणे में अपने शस्त्र छिपाये रखता था।
 
राव वैरीशाल के पुत्र सुरतान द्वितीय से जब छत्रशाल ने सिरोही छीन ली तो वह जोधपुर गया। महाराजा अजीतसिंह ने उसे देवातरा की जागीर दी थी जहाँ उसकी संतान अब भी रहती है। यह लाखावत शाखा के देवडे कहलाते हैं। छत्रशाल के पुत्र राव मानसिंह ने सिरोही में बढ़िया तलवारों का निर्माण किया था जो मानशाही कहलाती हैं और इसी कारण तलवार का एक पर्याय नाम सिरोही पड़ा है।
महाराजा अभयसिंह जोधपुर ने गुजरात के विद्रोही शाही प्रांतपाल नवाब सर बुलन्दखां पर सन् 1730 में एक बड़ी सेना के साथ चढाई की तब उक्त सेना सिरोही पहुँची तब रावल मानसिंह ने पाडीव के ठाकुर नारायणसिंह को अपनी सेना देकर महाराजा जोधपुर के साथ गुजरात पर भेजा था। अहमदाबाद के उस युद्ध में देवड़ों की सेना ने बड़ी बहादुरी दिखायी थी।
 
कुछ पीढ़ियों के बाद राव वैरीशाल दूसरा हुआ। उसने अपनी सैन्य शक्ति में पर्याप्त वृद्धि करली थी जिससे सिरोही राज्य मरहठों और पिण्डारियों के आक्रमण से बहुत कुछ सुरक्षित रहा।
 
महाराव शिवसिंह के शासनकाल में दूसरे राज्यों के सिरोही पर अनवरत हमलों के कारण सिरोही राज्य की व्यवस्था और आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई थी। इसलिए महाराव नारायणदास ने पुरोहित को कर्नल टॉड के पास जोधपुर भेजकर अंग्रेजों से संधि करने का प्रयास किया। इसके फलस्वरूप 11 दिसम्बर 1823 ई. में सिरोही राज्य की ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ संधि हुई। कर्नल टॉड पहिला अंग्रेज था जो ईस्वी 1822 में आबू देखने गया था।
 
महाराव स्वरूपसिंह की निस्संतान मृत्यु पर अंग्रेजों ने मंडार खानदान के तेजसिंह को अढाई साल की बाल अवस्था में सन् 1946 की जुलाई में सिरोही की गद्दी पर बैठाया और राजमाता की अध्यक्षता में रिजेन्सी कौंसिल बनाई। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद गृहमन्त्री श्री वल्लभ भाई पटेल के प्रयास से सिरोही रियासत गुजरात प्रांत का भाग बना दिया गया। इसके विरोध में जन आन्दोलन हुआ। तब ईस्वी 1949 में आबू और देलवाड़ा तहसील तो बम्बई
 
(गुजरात) के साथ ही रखे और सिरोही सहित शेष भाग राजस्थान में मिला दिया। अन्त में
राज्य पुनर्गठन आयोग की अभिशंसा पर भारत सरकार ने 1 नवम्बर 1956 को आबू और देलवाड़ा तहसील को राजस्थान में सम्मिलित कर दिया।
 
महाराव उम्मेदसिंह के भाई के पौत्र अभयसिंह ने सिरोही राज परिवार का सब से नजदीकी होने पर दावा प्रस्तुत किया। इस पर भारत सरकार ने एक जांच कमेटी नियुक्त की। उस की जाँच के बाद तेजसिंह के स्थान पर महाराव अभयसिंह 1949 में सिरोही का शासक नियत हुआ। आपकी इतिहास में बड़ा अभिरूचि है।
 
महाराव केशरीसिंह इतिहास और साहित्य का बड़ा प्रेमी था। इन्होंने हस्तलिखित ऐतिहासिक ग्रन्थों का संग्रह कर अपने राज भवन में पुस्तकालय बनाया था। इन्हें संस्कृत भाषा और स्वरोदय का भी अच्छा ज्ञान था।
 
इनके प्रोत्साहन और प्रेरणा से नवलदान आसियां ने चौहान सुधाकर और स्वरोदय ज्ञान नामक कई ग्रन्थों का सर्जन किया था। राघवदास आढा चारण ने महाराव की आज्ञा से 'चत्रभुज इच्छा प्रकाश' नाम से प्राचीन कविताओं का हस्तलिखित संकलन तैयार किया था। महा महोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने महाराव की प्रेरणा प्राप्त कर सिरोही राज्य का इतिहास लिखा था। जिस पर केशरीसिंह ने रोहिड़ा गांव में एक अरठिया कुआ को ईनाम में दिया था। इसी का अंग्रेजी अनुवाद पं. सीताराम बनारस वाले ने किया था। उसे भी महाराव ने पुष्कल द्रव्य देकर सम्मानित किया था।
 
महाराव केशरीसिंह के शासन काल में अंग्रेजों ने इनमे आबू पर 1916 में काफी रकबा जमीन लेकर उसकी एवज में सिरोही राज्य का खिराज माफ कर दिया था।
 
प्राचीन काव्य संकलनों और महाराव अखेराज पर रचित एक सम सामयिक दवा वेत नामक रचना में वर्णन है कि इन पर एक शाही सूबेदार चढकर आया था। उसके साथ सेलदार गांव के पास युद्ध हुआ। महाराव ने उसे हराकर मार डाला था।
 
इस प्रकार देवड़ा राजपूतों और उनके शासकों का इतिहास बड़ा उज्जवल और गौरवास्पद रहा है।
 
देवड़ों की उपशाखाएं
बाव नगरा-देवड़ा शाखा के प्रवर्तक देवराज के पुत्र बीजड़ के तीसरे पुत्र लक्ष्मण की संतति बाव नगरा देवड़ा कहलाये। यह मेवाड़ में चले गए थे। जहाँ आज उदयपुर नगर तथा पिछोला झील है, वहाँ ये लोग बसते थे। इनके मेवाड़ में मटोड़, देबारी तथा लकड़वास आदि जागीर में थे। मालवा में बरड़िया और वेपुर स्थानों पर इनकी आबादी हैं।
 
मामा वला-देवड़ा शाखा के प्रवर्तक देवराज का छोटा पुत्र अरिसिंह था, उसके पुत्र वरसिंह को मामावलि जागीर में मिला,जिससे उनकी औलाद वाले 'मामावला' देवड़ा कहलाये। बडगामा-महाराव बीजड़ के छोटे पुत्र लूणा का पुत्र तिहणुक था जिसका पुत्र रामसिंह और पौत्र देवीसिंह हुआ। उसे जागीर में बड़गाम मिला, जिससे उसके वंशज बड़गामा देवड़ा कहलाये। सिरोही में इनकी एक जागीर आकुना भी थी। बाकि बड़गांव आदि जोधपुर राज्यों में थे।
 
बागडिया-बीजड़ के लूणा हुआ उसके दूसरा पुत्र तिहणुक था और उसका छोटा पुत्र सबलसिंह हुआ। उसके वंशज बागड़िया देवड़ा कहलाये।
 
वसी के-महाराव बीजड़ का पाँचवां पुत्र लुढा था। उसके दो पुत्र थे माणक और मोकल वे मालवा में चले गए। इनकी औलाद के वसी की जागीर थी, जिससे ये वसी के देवड़ा कहलाये। वसी बाद में ग्वालियर राज्य में थी।
 
कीतावत्-महाराव लूमा का दूसरा पुत्र दूदा था। इसकी संतान में कीतू हुआ जिससे उसके वंशज कीतावत देवड़ा कहलाते हैं। ये सिरोही और जोधपुर दोनों इलाकों में हैं।
 
गोसलावत-लूमा का तीसरा पुत्र चाहड़ था, उसके पुत्र गोसल से 'गोसलावत देवड़ा" कहलाये। ये लोक सिरोही इलाके में मामावली आदि में हैं।
 
डुगरावत-महाराव रिडमल का दूसरा पुत्र गजसिंह था। गजसिंह के पुत्र डुंगरसिंह के वंशज डुंगरावत देवड़ा कहलाते हैं। इनका सिरोही राज्य में बड़ा प्रभाव था। इनके मुख्य ठिकाने पांडीव कालंद्री, मोटागाँव (मोहब्बत नगर) और जावाल थे।
 
लोटाणचा-महाराव शिवभाण के दूसरे पुत्र सिंहा के वंशज लोटाणचा देवड़ा कहलाते हैं। ये सिरोही इलाके में हैं।
वालदा-शिवभाण के पुत्र सातल के वंशज वालदा देवड़ा कहलाये। लखमणोत-महाराव शिवभाण के तीसरे पुत्र लखमण की औलाद वाले 'लखमणोत देवड़ा' कहलाते हैं ये सिरोही और जोधपुर दोनों इलाकों में हैं।
 
लाखावत-महाराव लाखा बड़ा वीर राजा हुआ। इसके वंशज लाखावत देवड़ा कहलाते हैं। ये जहाँ जहाँ जाकर बसे वहाँ के लाखावत कहलाते हैं परन्तु वैसे लाखावत एक ही हैं।
देवड़ा जागीरदार सिरोही के
 
नांदिया-सिरोही के महाराव उम्मेदसिंह के छोटे भाई तेजसिंह को यह जागीर दी गई थी। ये महाराज कहलाते हैं तथा सिरोही राज्य के समय कोई खिराज नहीं देते थे। यहाँ के महाराज रामसिंह सिरोही जिले के जिला प्रमुख रहे थे।
 
अजारी-महाराव उम्मेदसिंह के छोटे भाई जुवानसिंह को अजारी की जागीर मिली थी। महाराज इनका खिताब था। यह भी सिरोही राज्य को कोई रेख नहीं देते थे।
 
मंडार-सिरोही के नरेश मानसिंह के तीसरे पुत्र जोरावर सिंह थे, जिनको मंडार जागीर में मिला था। यहाँ फिर दो पांती हो गई थी। यहाँ के तेजसिंह को अंग्रेजों ने सिरोही नरेश महाराव स्वरूप सिंह की निःसंतान मृत्यु हो जाने पर सिरोही का महाराव बनाया था। देश के स्वतन्त्र होने पर सरकार ने मनादार के महाराज अभयसिंह को उजरदारी करने पर हकदारी की जाँच करके तेजसिंह को हटा कर अभयसिंह को सिरोही के महाराव बनाया।
 
पाडीव-यह ठिकाना महाराव रिडमल के दूसरे पुत्र गजसिंह के वंश में हैं। गजसिंह के पुत्र डुंगरसिंह से डुंगरावत देवड़ा कहलाये। डुंगरसिंह से चौथी पीढी पर बज्जा हुआ, उससे बज्जावत देवड़ा पाडीव के हैं। ये ठाकुर राज श्री कहलाते थे। कालंदरी-यह ठिकाना डुंगरावत देवड़ों का था। जावाल-यह भी डुंगरावत देवड़ों का ठिकाना था। मोटागांव-(मोहब्बत नगर)-यहां के ठाकुर राज श्री भी डुंगरावत देवड़ा है। यहां का मोहब्बत सिंह राजस्थान लेजिसलेटिव असेम्बली का सदस्य था, तथा सिरोही का जिला प्रमुख भी रहा था। मोहब्बत सिंह ने ही अपने नाम पर मोटा गांव का नाम बदल कर मोहब्बत नगर करवाया ।
नीमज-यहाँ का ठाकुर राज श्री लखावत देवड़ा हैं सिरोही के महाराव लखा का छोटा पुत्र उदयसिंह था,उसके रणधीर और रणधीर के सूजो हुआ। इनके वंश में नीमज का ठिकाना था। नीमज के पालनपुर से भी 3 गांव जागीर में थे।
 
रोहआ-यह भी लखावत देवड़ों का ही ठिकाना था। यह सिरोही में महाराव लखा के पुत्र उदयसिंह के छोटे प्रभु सामन्त सिंह के वंशज हैं। श्री दलपत सिंह श्री माधोसिंह राजस्थान विधान सभा के सदस्य रहे हैं।
 
भटाणा-यहाँ के देवड़ा महाराव लखा के पुत्र उदयसिंह के रणधीर सिंह के छोटे पुत्र प्रतापसिंह के वंशज हैं। ये तेजावत देवड़ा कहलाते हैं।
 
दबाणी-ये लखावत देवड़ा हैं महाराव लखा के पड़ पौत्र सूजा के वंश में हैं।
दताणी-यह ठिकाना भी महाराव लखा के पड़ पौत्र प्रतापसिंह के खानदान में था।
हरणी-यहाँ के देवड़ा महाराव लखा के पौत्र सामन्त सिंह के वंशधर हैं।
 
काछोली-सिरोही के प्रसिद्ध वीर महाराव सुरताण के छोटे पुत्र सूरसिंह के खानदान में हैं।
लास-महाराव अखैराज ने अपने पिता को मारने वाले पृथ्वीराज देवड़ा को मारने पर राजसिंह कुमावत देवड़ा को जागीर में दिया था।
 
छीबा-यह गांव महाराव अखैराज ने राजसिंह के भाई जीवा कुमावत देवड़ा को अपने पिता के बैर लेने के उपलक्ष में दिया था।
 
मारवाड़ (जोधपुर) के देवड़ा जागीरदार
 
बड़गांव-यह ठिकाना बड़गांव देवड़ों का था। यह जालौर जिले के जसवन्तपुरा इलाके में था। इसके 15000 की रेख थी तथा जागीर में 7 गांव थे। बड़गांव को इकेवडी ताजीम थी तथा तीसरे दर्जे के न्यायिक अधिकार थे। श्री ठा. मंगलसिंह राजस्थान विधान सभा के सदस्य रहे हैं।
 
बांकली-यह पाली जिले के बाली इलाके में थी। इस ठिकाने की रेख 5000 वार्षिक की थी। जागीर में तीन गांव थे। यहां के ठाकुर को इकेवड़ी ताजीम थी। जब घोड़ों की नौकरी थी तब इनके 5 घोड़े नौकरी में होते थे।
 
बीसलपुर-यहाँ के लखावत देवड़ा हैं। यह जागीर पाली जिले के बाली इलाके में थी। इसकी रेख 7800 की थी। जागीर में 9 गांव थे तथा इकेवड़ी ताजीम थी इस ठिकाने के 8 घोड़े नौकरी में होते थे। श्री पृथ्वीसिंह राजस्थान विधान सभा के सदस्य रहे हैं।
 
कोरटा-यह जागीर पाली जिले के बाली इलाके में थी। इसकी रेख 7000 की थी, जागीर में 8 गांव थे। इसकी इकेवड़ी ताजीम थी। इसके नौकरी में सात घोड़े रहते थे।
 
नोसरा-यह देवड़ों की जागीर जालौर जिले में थी। इसकी रेख6700 थी और जागीर में 7 गांव थे तथा इकेवड़ी ताजीम थी। इसके 6 घोड़े नौकरी में दौड़ते थे।
 
मारवाड़ (जोधपुर) में देवड़ों के खास चोकी के ठिकाने निम्न थे
 
देतावास-यह ठिकाना जालौर जिले में था। इस की रेख 625 रुपयों की थी तथा एक गांव जागीर में था।
देवतड़ो-यह पाली जिले के बाली इलाके में था। इस ठिकाने की रेख 2500 रुपये थी व एक गांव जागीर में था ।
 
देवरियो-यह ठिकाना नागौर जिले में था। इसकी रेख 1000 की थी। इसके आधा गांव जागीर में था।
धवरिया-यह पाली जिले के बाली इलाके में था। इसकी रेख 1000 की थी तथा एक गांव जागीर का था।
 
रामपुरी-यह जोधपुर जिले में था। इसकी रेख एक हजार की थी।
 
गलथणी-पाली जिले के बाली इलाके में यह ठिकाना था।
सन् 1947 में स्वतन्त्र भारत राष्ट्र में तत्कालीन राजपूताने की रियासतों का भी विलय हो गया। देशी रियासतों के राजाओं व जागीरदारों ने स्वेच्छा से भारतीय संघ में शामिल होने का निर्णय लिया था। बदले हुए परिवेश में राजस्थान के राजपूतों ने भी अपने को नई राजनैतिक एवं सामाजिक स्थितियों के अनुरूप ढाल लिया। राजस्थान में पंचायत राज के गठन के बाद इसमें सक्रिय भाग लिया और देवड़ा वंश के राजपूतों ने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया।
 
श्री रामसिंह जी नांदिया,श्री मोहब्बतसिंह जी मोहब्बत नगर व श्री विजयसिंह जी डमाणी ने सिरोही के जिला प्रमुख पद पर कार्य किया। इसी प्रकार शिवगंज पंचायत समिति के प्रधान के पद पर श्री माधोसिंह जी रेवदर, श्री दलपतसिंह रहुआ ने कार्य किया।
 
श्री मंगलसिंह जी बड़गांव ने प्रधान, जिला प्रमुख एवं विधायक के पदों पर कार्य कर जनता की सराहनीय सेवा की है।
 
राजस्थान विधानसभा के विधायी कार्य में देवड़ों ने प्रशंसनीय योगदान दिया है। श्री मोहब्बतसिंह जी मोहब्बत नगर पिंडवाड़ा और सोरोही से क्रमशः सन् 1952एवं 1957 में विधानसभा सदस्य रहे हैं। श्री दलपतसिंह जी रेवदरसे सन् 1957 एवं सन् 1962 में विधानसभा सदस्य चुने गए थे। श्री मदनसिंह भेव सिरोही से सन् 1967 में, श्री माधोसिंह जी रहवा रेवदर से सन् 1977 में राज्य विधानसभा में जन प्रतिनिधि थे। इसी वंश के श्री पृथ्वीसिंह जी बीसलपुर सुमेरपुर (पाली) से विधान सभा में प्रतिनिधि थे।
 
इस प्रकार देवड़ा वंश के राजपूतों ने अपने को लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था को अंगीकृत करके राजस्थान के नवनिर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान किया है एवं कर रहे है। यह जनसेवा का ही परिणाम है कि उन्हें विभिन्न क्षेत्रों से जनता का प्यार एवं समर्थन प्राप्त हुआ।
(लेखक - देवीसिंह मंडावा , पुस्तक - क्षत्रिय राजवंशों का इतिहास )

Sunday, 8 January 2017

शेखावत कछवाहा

(क्षत्रिय राजवंशों का इतिहास )
 
अयोध्या नरेश मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र के जेष्ठ राजकुमार कुश के वंशधर कुशवाहा (कछवाहा) हैं। नरवर के सोढ़देव के पुत्र दूलहराय ने विक्रम की 12 वी. शती में दौसा पर आधिपत्य स्थापित कर राजस्थान में कछवाहा राज्य की आधारशिला स्थापित की। दूलहराय के पुत्र काकिल ने मीणों के अन्य स्थानों को हस्तगत कर आमेर को अपनी राजधानी बनाया। उदयकर्ण आमेर के बारवें अधिपति हुए।
 
कछवाहों के राजा उदयकर्ण कालीन राजनीतिक स्थिति और प्रभुत्व का राव जैतसी बीकानेर के समकालीन एक अज्ञात कवि ने इस प्रकार व्यक्त किया है ।
कछवाहा ऊतर भड़ किंवाड़, चढ़िया गिरन्दे चक्कि चाढ़ी ।
पुठी हथ मग्गई लग्गि पाईं, रइत कीध चाउन्ड राइ ॥
 
राजा उदयकर्ण (वि. 1423-1445) के आठ पुत्रों मे राव बाला एक पुत्र थे। इन्हें अपने पैतृक राज्य से बरवाड़ा सहित 12 ग्राम समूह का भू-भाग मिला यह आमेर नरेश को यथा आवश्यकता कर रूप में घोड़े देते रहे। राव बाला के 12 पुत्र हुए, जिनमें बड़े पुत्र मोकल बरबाड़ा की गद्दी पर बैठे। उनके अन्य भाइयों में खींवराज, गोविन्ददास तथा नाथा की संतति अपने पितामह के नाम पर बालापोता, खरथजी के करणावत मोकाजी के मोकावत, भीलाजी के भीलावत,झामावत,ढुंगरसी के जीतावत,बींजराज के बींजावत और सांगा के सांगाणी नामों से प्रसिद्ध हुए।
 
वृद्धावस्था के निकट जाने पर भी जब राव मोकल के पुत्र नहीं हुआ तो वे तीर्थाटन के लिए वृंदावन गए। वृन्दावन में उनकी चैतन्य महाप्रभु के दादा गुरू माधवेन्द्र गुसांई से भेंट हुई। गुसांईजी ने राव मोकल को पुत्र प्राप्ति का वरदान देते हुए अपने पूर्वज महाराजा दिलीप का उदाहरण देते हुए गोपीनाथ का इस्ट और गोचारण की आज्ञा दी
 
 
 (मंगल कुल प्रकाश काव्य) राव मोकल माधवेन्द्र गुसांईजी के आशीर्वचन को सन्नद्ध स्वीकार कर नाण लौट आए और दृढ़ निष्ठा के साथ गोपालन में लग गये। और कृष्ण भक्ति में तल्लीन रहने लगे। संयोगवश उसी काल में भ्रमणशील मुस्लिम दरवेश शेख बुरहान से वन में राव मोकल की भेंट हुई। दरवेश ने भी उनकी मनोव्यथा पहिचान कर पुत्र प्राप्ति का वचन दिया। राव मोकल की अनन्य भक्ति और दृढ़ाभिलाषी फलवती हुई और वि.सं. 1490 विजयदशमी के पावन पर्व पर शेखावत शाखा के प्रवर्तक प्रतापधनी राजकुमार शेखा संस्कृत (नाम शेषमल्ल) का जन्म हुआ-
समै विक्रमी वेद नाखित्र स्वामी,निबे साल आसोज को मास नामी।
भयो जन्म शेखा समै बल्लिहरी, विजैदशमी तिथि हिमांस ॥
 राव शेखा जब 12 वर्ष की आयु में थे तब ही संवत 1502 में इनके पिता राव मोकल का स्वर्गवास हो गया। राव शेखा ने अपने काका खींवराज के संरक्षण में साहसपूर्वक अपने राज्य की सुरक्षा और समृद्धि की और 16 वर्ष की वय प्राप्त होते राज्य का सम्पूर्ण संचालन भार ग्रहण कर लिया ।
इधर तो राव शेखा ने अपना राज्यकार्य संभाला और उधर 1200 सौ पन्नी पठानों का एक दल जीवन-निर्वाहार्थ दिल्ली की ओर जाता हुआ, अमरसर के पास राव शेखा के बीहड (संरक्षित वन्य भूमि) में आकर ठहरा। राव शेखा ने यह सूचना प्राप्त होने पर उनके मुखिया से भेंट की और उसे निम्न शर्तों के साथ बारह ग्राम जीवन-यापन के लिए जागीर में देकर अपने पास रख लिया। पठानों और शेखा में निम्न शर्त तय हुई थी जिनके प्रतीक और दोनों समाजों में सम्मान की भावना आज भी कतिपय अंशों में प्रचलन में है:-
 
1. पठान और शेखा के वंशधर युद्धकाल में एक ही रसोवड़े में बना भोजन करेंगे।
2. पठान हिन्दुओं के पूज्य गाय, बैल तथा मोर का न शिकार करेंगे और न मांस सेवन करेंगे।
3. शेखा के वंशधर मुसलमानों के अभक्ष्य सूअर को न मारेंगे और न खायेंगे।
4. जल के प्रमुख स्रोत कुओं पर मरवे जो मीनार की आकृति के होते हैं, बनायेंगे जिससे मुसलमान
    उन्हें मस्जिद की आकृति मानकर कुओं को दूषित नहीं करेंगे।
5. शेखा के वंशधरों के ध्वज पीत वर्णीय और उस पर लपेटा नीले वर्ण का होगा।
6. पानी भरने वाला सिका मुसलमान होगा और वह अपनी कमर पर लाल रंग के वस्त्र का
    कमरबंधा बांधकर पानी भरकर लायेगा। लाल रंग हनुमान के लंगोटे का प्रतीक है।
7. झटके के स्थान पर हलाल का माँस ही रसोवड़ों में काम में लिया जायेगा।
8. शेखा की संतति वाले सद्य जात शिशु के गले में बद्धी (चर्म की रस्सी) पहिनायेंगे। और हाथों के
   नीले मणिके और नीले धागे के पुणछे (डोरे) बांधेगे।
9. स्त्रियों पर कोई भी न कुदृष्टि डालेगा और न अपहरण अत्याचार करेगा।
10.  मन्दिर और मस्जिदों की मर्यादा और धार्मिक संस्थाओं पर आघात नहीं किया जायेगा।
 
 
     (श्री सौभाग्यसिंह शेखावत को मौखिक परम्परा से प्राप्त जानकारी के आधार पर)
 
 
इस प्रकार जो शर्त दोनों में तय हुई थी उनका शेखावत समाज में बहुलतः अद्यावधि पालन होता है।
 
 
राज्य संचालन भार ग्रहण कर राव शेखा ने अपने पड़ौसी नागरलाल के उत्पथगामी सांखलों (परमारों की शाखा) का दमन कर उस पर अपना अधिकार किया। तदनन्तर सांखलों के सहयोगी मेड तथा बैराट क्षेत्र के यादवों को पराजित किया और नाण से समीप ही उत्तर में अमरा धायभाई की ढाणी के स्थान पर अमरसर नामक गांव बसाकर वहाँ भूमि पर किला बनाया तथा अपना मुख्यावास किया। अमरसर की स्थापना तथा दुर्ग निर्माण वि.सं. 1517 में माना  जाता है। (नैणसी)
 
 
राव शेखा स्वाभिमानी, साहसी और स्वाधीन प्रवृत्ति के थे। उनके पितामह राव बाला के समय में आमेर नरेशों को जो घोड़े भेंट करने की परम्परा बन गई थी, बन्द कर दी गई।
 
 
आमेर नरेश राजा चन्द्रसेन ने राव शेखा द्वारा घोड़े न देने को अपने अधिकार का हनन माना और राव शेखा और राजा चन्द्रसेन में तीव्र मनमुटाव और पारस्परिक कलह उत्पन्न हो गई। तब राजा चन्द्रसेन ने राव शेखा का दमन करने के लिए हमले किए-दोनों में कई लड़ाइयाँ हुई ।
 
 
अन्त में राव शेखा और राजा चन्द्रसेन दोनों बन्धु राज्यों में कूकस नदी के दक्षिणी तट पर युद्धार्थ मोर्चे जम गये। इस आसन्न भयंकर युद्ध संकट से दोनों राज्यों को विनाश से बचाने के लिए राव नरूजी । (अलवर राज्य वालों के पूर्वज) ने तटस्थ भाव से मध्यस्थता कर इस विनाशलीला को परस्पर बातचीत से समाप्त कर अमरसर और आमेर राज्यों में पुनः सौहार्द और मेलमिलाप स्थापित किया। फलतः राजा चन्द्रसेन और राव शेखा में भविष्य में आनाक्रमण संधि होकर कूकस नदी के तटों को ही आमेर और अमरसर राज्यों की सीमा रेखा निश्चित की गई और राव शेखा को आमेर से स्वतन्त्र शासक के रूप में मान्य किया गया। साथ ही बाह्य शत्रु द्वारा आमेर पर आक्रमण होने पर राव शेखा द्वारा आमेर की सैन्य सहायता करना निश्चितकिया गया। इस प्रकार उदीयमान दोनों स्वतन्त्र शासकों में परस्पर मनमुटाव समाप्त होकर भ्रातृत्व का पुनः बीजारोपण हुआ।
 
 
इसी अवधि में बागड़ क्षेत्र के नवाब इख्तियारखाँ ने अकारण अनीतिपूर्वक अपमानित करते हुए एक कछवाहा राजपूत को मार डाला। इस पर राव शेखा ने बागड़ी पर आक्रमण कर उसके दुष्कृत का फल चाखाया
 
 
जब मालवा के सुल्तान नासीरुद्दीन के शाहजादे ने आमेर पर आक्रमण किया। राव शेखा ने इस अवसर ससैन्य आमेर की सेना के साथ भाडोरेज (दौसा) स्थान पर आक्रांता से युद्ध लड़ा और उसे पराजित किया। इस प्रकार आमेर तथा अमरसर के गौरव की रक्षा की।
 
 
इधर हरियाणा प्रदेश के और शेखा के मनोमालिन्य चल रहा था। राव शेखा की उदयमान शक्ति से वे शक्ति परीक्षण में जुटे हुए थे। राव शेखा ने उनकी मनोइच्छा के पूर्व ही उन पर चढ़ाई कर चरखी, दादरी, भिवानी आदि को विजय किया। इस विजय से राव शेखा की धाक, वर्चस्व और साहस का सब ओर प्रभाव जम गया। उसके प्रभाव और प्रभुत्व का जयनाद हिसार और दिल्ली के सुल्तानों के कर्ण गाहरों में गूंजने लगा। प्रतीत होता है कि इन विजयों में उन्हें पर्याप्त धन और यश प्राप्त हुआ और उक्त द्रव्य से उन्होंने अपनी प्रजा की सुरक्षा और अभयता के लिए अमरसर के पहाड़ों में शिखरगढ़ नामक दुर्ग का निर्माण करवाया।
 
'शेखावाटी प्रकाश' नामक इतिहास में उल्लेख है कि दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने शेखा पर आक्रमण किया था। संभव है कि राव शेखा के वर्धमान राजनैतिक प्रभाव से सशक होकर बहलोल लोदी ने अपनी एक सैन्य टुकड़ी शेखा पर भेजी होगी, परन्तु इस आक्रमण में सुल्तान सफल मनोरथ नहीं हुआ।
 
 
तत्कालीन गौड़ावाटी में गौड़ क्षत्रियों के झंथर, धाटना, मारोठ आदि छोटे-छोटे कई ठिकाने थे। जातीय संगठन के बल पर वे शासक-धर्म के विपरीत आचरण करने में संकोच नहीं करते थे। गौड़ावटी के झुंथर स्थान का शासक कौलराज अपने नाम पर कौलोलाव नाम का एक तालाब खुदवा रहा था। उसने यह आदेस प्रसारित कर रखा था कि इस मार्ग से जाने वाला प्रत्येक पथिक तालाब से निश्चित संख्या में मिट्टी के टोकरे बाहर निकाल कर ही गन्तव्य स्थान पर जा सकता है। देववशात् उक्त समयावधि में एक कछवाहा राजपूत तीन चार सैनिक साथियों के साथ अपने ससुराल मारवाड़ से सपत्नीक ढूंढ़ाड़ की ओर आ रहा था। कौलराज के सैनिकों ने तालाब सम्बन्धी राजाज्ञा उसे सुनाई। इस पर उस राजपूत और साथियों ने इसे जन कल्याण मानकर सहर्ष अपने भाग की मिट्टी डाल दी और वहाँ से आगे जान लगे। तब गौड़ों ने कहा कि तुम्हारी पत्नी से भी मिट्टी डलवाकर आगे जाओ। इस पर उस राजपूत और उसके सहगामियों ने पत्नी के ऐवज की मिट्टी भी निकालने की कही, पर गौड़ इस पर अड़ गए कि यह स्त्री स्वयं वैली (रथिका) से उतर कर मिट्टी डाले। इस पर कछवाहा और गौड़ों में ठन गई और वह कछवाहा सरदार दो तीन गौड़ों को मार कर काम आया। तदनुपरांत उसके साथी  जाट और नाई ने उसका अन्तिम संस्कार किया और उसकी पत्नी को लेकर अमरसर आये। उस क्षत्रिय बाला ने अपने पति की मृत्यु और गौड़ों की दुनीति की करुण कथा राव शेखा को सुनाई ।
 
 
कही मारतां बी अकेलो न पेखो।  सदा पूठ पैं मो तपे राव
इणी कारणे आपकी सरण आई , भुजां वैर की लाज थारे भुलाई।
 
गौड़ों के इस कुकृत्य ने राव शेखा के तन बदन में क्रोधाग्नि धधका दी। वह तत्क्षण उठकर झंथर पर चढ़ दौड़े और कौलराज को मार कर उसका सिर काट कर अमरसर ले आए। कौलराज के रक्त से अपने सजातीय कछवाहा का तर्पण किया। और उसकी विधवा पत्नी को शांति प्रदान की। इस घटना से गौड़ावाटी के गौड़ों में हलचल मच गई और फलस्वरूप राव शेखा और गौड़ों में ग्यारह युद्ध हुए। दोनों पक्ष के हजारों सैनिक मारे गये। ग्यारहवाँ और गौड़ों से अन्तिम युद्ध घाटवा स्थान पर हुआ जिसकी लौकिक स्मृति पांच सौ से अधिक वर्षों के बाद भी जन मुखों पर इस प्रकार जीवित है
गौड़ बुलावे घाटवे , चढ़ आवो शेखाह ।।
लसकर थारा मारणा, देखन री अभलेखाह ॥
 इस युद्ध में राव शेखा के जयेष्ठ पुत्र दुर्गादास और द्वितीय पुत्र पूर्णमल मारे गये। अनेक शूरवीर सैनिक धराशायी हुए। शेखावतों की विजय हुई और घावों से लथपथ राव शेखा भी दूसरे दिन वि.सं. 1545 को रलावता ग्राम की सीमा में जीण माता के पास वीरगति को प्राप्त हुए।
 
 रलावता और मोहनपुरा ग्रामों की सीमा पर उस वीरधीर युग पुरुष राव शेखा की स्मृति में एक छत्री बनी हुई है।
 
राव शेखा के पांच रानियां और 12 पुत्र और एक पुत्री राधवकुंवरि नाम की थी । राधवकुंवरि का परिणय मेड़ता के शासक राव दूदा के साथ हुआ था। राव शेखा के ज्येष्ठ कुमार दुर्गादास थे और उनकी संतति ही शेखावतों में पितृ-परम्परा से टीकाई (राजपट्टतिलकायत) थे। दुर्गादास की माता टाक राजपूत कुल थी। इसलिए दुर्गादास के वंशज टकनेत शेखावत कहलाते हैं। शेखा की मरजी के अनुसार छोटे होते हुए भी कुमार रायमल को राजगद्दी पर अभिषिक्त किया गया। अन्य पुत्रों के नाम क्रमश: रतनसिंह, भरतसिंह, त्रिलोकसिंह, अभयसिंह, अचलदास, पूर्णमल, प्रतापमल, कुम्भकरण, रणमल और भारमल था। इनसे शेखा के वंशधरों की विभिन्न शाखाओं का प्रादुर्भाव हुआ।
 
 
जहाँ राव शेखा महान् वीर, नीति निपुण, प्रजावत्सल, जातीय गौरव के रक्षक और कुशल संगठक थे, वहां वह हिन्दू मुस्लिम एक्य के प्रतीक, पुरुष और नारी समाज की मान प्रतिष्ठा के आदर्श संरक्षक भी थे। उसने पठानों से संधि कर एक ऐसा अद्वितीय कार्य किया जिससे शेखावाटी में कभी हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष नहीं हुआ। यदि यह संधि शेखा नहीं करते तो कहा नहीं जा सकता कि विगत पाँच सौ वर्षों के दीर्घकाल में लक्षाधिक हिन्दू और मुसलमानों के  जन, धन और प्रतिष्ठा की कितनी होलिकाएँ जल चुकी होती।
 
 
जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि राव शेखा के 12 पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र दुर्गादास थे। अपनी माता टाँकणजी के जातीय सम्बोधन के कारण दुर्गादास के वंशज टकनेत कहलाते हैं।
टकणेतों में अलखा अपने समसामयिकों में परम ईश्वर भक्त और आदर्श व्यक्ति माने जाते थे। वह राजा गिरधरदास और उनके पुत्र राजा द्वारिकादास खंडेला के प्रधान थे। अब टकणेत सीकर और झुन्झनू जिलों में है।
 
रतनाजी-राव शेखा के द्वितीय पुत्र की संतति के रतनावत (शेखावत) संज्ञा से प्रसिद्ध है।
राव शेखा ने जब हरियाणा पर आक्रमण किया था, उन युद्धों में रतना ने बड़ी वीरता प्रदर्शित की थी, इसलिए शेखा ने हरियाणा में विजित इलाका रतना को दे दिया था, हरियाणा के इस इलाके में रतनावत शेखावत अच्छी संख्या में वर्तमान हैं।
 
 
राजस्थान में ये जयपुर जिले में हैं। तिलोकसी-यह राव शेखा का पुत्र था और इसकी संतान मिलकपुर ग्राम वासी संबोधन से मिलकपुरिया शेखावत कहलाते हैं।
 
 
आभाजी-आभा के पुत्र पौत्र भी मिलकपुर ग्राम में रहने के कारण मिलकपुरिया शेखावत कहलाते हैं। आभा का वंशधर उदयमान बादशाही मनसबदार था।
 
 
अचलाजी-इनके वंशज भी मिलकपुर ग्राम में निवास के कारण मिलकपुरिया सम्बोधन से जाने जाते हैं। वि.सं. 1590 के हिंदाल के युद्ध में अचलदास का पुत्र रामचन्द्र मारा गया था ।
 
अचलदासोतोंमें बिलवा के मुलकपुरियों ने वि.सं. 1872 के कुं. बख्तावर सिंह जी खेतड़ी के बाघोर के युद्ध में अपूर्व पराक्रम दिखाया था। वे गोलों और गोलियों की वर्षा में भी अग्रसर होकर बाघोर दुर्ग के प्रवेश कपाट को ध्वंस कर दुर्ग पर अधिकार करने में सफल हुए थे। इस शौर्य प्रदर्शन के उपलक्ष में खेतड़ी की ओर से बाढ़ाकी ढाणी गांव जागीर में दिया गया था ।
 
कुम्भाजी-यह भी राव शेखा के पुत्र थे और दीर्घकाल तक खेजडोली ग्राम में निवास करने के कारण खेजडोलिया शेखावत कहे जाने लगे। इनमें सातल के पुत्र बहुसंख्यक हैं। यह अपने को 'सातोलपोता' भी कहते हैं।
 
राजा मानसिंह आमेर और राव मनोहर दास मनोहरपुर की सीमा विवाद की लड़ाई में कुम्भा का पौत्र ईश्वरदास जयमलोत मनोहरदास की सेना का सेनापति था। इसके पुत्र पृथ्वीराज ने कटार के प्रहार से खूंखार सिंह को मार गिराया था। इसका पौत्र अजीतसिंह छोटेशाही मनसबदारों में था।
शेखा के पुत्र रिडमलजी और भारमलजी के वंशज भी खेजडोलिया कहलाते हैं।
भारमल का आठवां वंशधर कुशलसिंह वि.सं. 1847 जेष्ठ वदि2 को नवाब इस्माइलबेग, ताहरबेग के साथ लड़ाई में नीम का थाना के पास मारा गया था।
खेजड़ोलिया शेखावतों में बड़े वीर पुरुष हुए हैं।
 
रावरायमल-यह राव शेखा के छोटे और प्रतापी पुत्र थे। राव शेखा के उत्तराधिकार के रूप में सं. 1545 को अमरसर मे यह उनके सिंहासनारूढ़ हुए। इस अवसर पर आमेर के राजा चन्द्रसेन और अलवर नरेशों के पूर्वज राव नरू ने भी अमरसर आकर तिलक समारोह में भाग लिया था। गोड़ावाटी के युद्ध-क्षेत्रों में राव शेखा के मारे जाने से आमेर राजवंश की राजावत, शेखावत, कुंभावत और नरूका शाखाओं में गौड़ों को दण्डित कर प्रतिशोध लेने के लिए क्रोधाग्नि धधक रही थी। उधर गौड़ भी भावी भय से आतंकित थे।  इस भय से  मुक्ति प्राप्त करने का क्षात्र परम्परानुसार गौड़ों के सामने एक ही विकल्प था कि वे अपनी कन्या का रायमल  से पाणिग्रहण कर आसन्न संकट त्राण प्राप्त करें। अन्त में गौड़ों के प्रमुख मारोठ के शासक राव रणमल ने अपनी पुत्री का राव रायमल से विवाह कर झुंथर के 51 गांव दहेज में देकर इस विग्रह का अन्त किया ।
इस प्रकार से गौड़ों और कछवाहों में मैत्री, सौहार्द और अबैर का सम्बन्ध स्थापित हो गया ।
 
 
राव रायमल परम साहसी और दृढ़ संकल्प का धनी था। उसने अपने पिता द्वारा विजित 360 ग्राम समूह के अमरसर राज्य की रक्षा ही नहीं की अपितु उसके विस्तार के लिए कुशल सेना का भी गठन किया। दिल्ली के भावी सुल्तान शेरशाह सूर (पठान) का पिता हसनखाँ पठान राव रायमल की सैनिक सेवा में था और दिल्ली के भावी सुल्तान शेरशाह का जन्म भी उसके पिता को प्रदत्त जागीर के सिमला नामक ग्राम में हुआ था।
 
 
राव रायमल के उदयमान प्रभाव रवि से संत्रस्त होकर मेवात के राज्याधिकारी पठान हिंदाल ने वि.सं. 1550-59 के मध्य अमरसर पर आक्रमण किया। इस संकटापन्न वेला पर राव रायमल की सहायतार्थ भैराणा केशासक नरू और आमेर के राजा चन्द्रसेन के पुत्र कुंभा (कुंभकरण) भी अपनी-अपनी सेना लेकर अमरसर आ गए। बड़ा घमासान युद्ध हुआ। हिंदाल पराजित होकर भाग गया, परन्तु आमेर का सेनानायक कुमार कुंभकरण चन्द्रसेन वीरगति को प्राप्त हुआ। इस विजय से रायमल की कीर्ति सर्वत्र फैल गई और प्रतिवेशी निर्वाण और तोमर क्षत्रिय स्वमेय रायमल के पक्षधर बन गए।
 
भारतीय स्वतन्त्रता के लिए लड़े गए वि.सं. 1590 के खानवा के महाराणा संग्रामसिंह और मुगल बादशाह बाबर के युद्ध में रायमल ने ससैन्य महाराणा के पक्ष में युद्ध किया था।
 
 
मुगल शहंशाह हुमायूं ने मेवात का राज्यपाल अपने भाई मिर्जा हिंदाल को नियत किया था। कछवाहों और मुगलों में तब प्रबल विरोध चल रहा था। फलतः हिंदाल ने अमरसर के कछवाहों का दमन करने के लिए अमरसर के समीपस्थ अनेसरी गांव के मैदान में हिंदाल ने आक्रमण किया। उभयपक्षों में प्रचण्ड संग्राम हुआ। राव रायमल की सहायतार्थ आए हुए आमेर पति राजा पूर्णमल, रायमल के भाई भारमल, अभयमल का पुत्र रामदास, हरिसिंह देवीदास का पुत्र, हरवन का पुत्र सूरजमल, दूदा का पुत्र कीता (कीर्तिपाल) (तीनों कुन्डल के कछवाहा) आहड़ काबा, तंवरावाटी का राव डुंगरसी लाखावत तोमर, दादरी का रूपदेव, सैकड़ों कर्णावत और पठान वीर खेत रहे। युद्ध का परिणाम राव रायमल के प्रतिकूल रहा।
 
राव रायमल ने राव मालदेव द्वारा मारोठ के गौड़ों पर आक्रमण करने पर गौड़ों की सहायता की और अन्त में दोनो में सन्धि करवायी। महाराणा संग्रामसिंह मेवाड़ के सांभर के नमक कर में से अपना कर भाग लिया, पीसांगण के सांगा परमार को परास्त किया और राज्यच्युत मेड़ता के राव वीरमदेव को डेढ़ वर्ष तक नराणा में शरणागत रखकर क्षत्रिय धर्म का उज्ज्वल आदर्श स्थापित किया
 
 
बड़वों की बही के वृतांतानुसार राव रायमल ने अपने जीवन काल में 41 युद्धों में भाग लिया था। अन्त में वि.सं. 1594 में 88 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त कर स्वर्गवासी हुए।
 
 
राव रायमल अपने युग में राजस्थान के प्रभावशाली राजाओं में अग्रणी थे। वे जैसे वीर, नीतिज्ञ और पराक्रमी थे वैसे ही सुदक्ष प्रशासक, स्वातंत्र्य प्रिय और प्रजावत्सल राजा थे।
 
 
राव रायमल के सूरजमल, तेजसिंह, सहसमल, जगमाल,सिंहमल और सुरतान नामक पुत्र थे। अग्रिम पंक्तियों में राव सूरजमल के भाईयों पर सक्षिप्त प्रकाश डालने के बाद राव सूरजमल  की उपलब्धियों पर विचार करेंगे।
 
 
तेजसिंह-तेजसिंह के पुत्र पोत्रादि तेजसिंह के शेखावत कहलाते हैं और इनके अधिकार क्षेत्र में बाल का क्षेत्र (अलवर जिले का वानसूर क्षेत्र) था। तेजसिंह आमेर के राजा रतनसिंह, भीमसिंहोत के प्रधान थे। इनके शक्तिसिंह, मानसिंह और रामसिंह तीन पुत्र थे। शक्तिसिंह और मानसिंह का ननिहाल तंवरों के था। इनकी जागीर में पाथरड़ी सहित पाँच ग्राम थे। यह महात्मा संजानाथ के भक्त थे। उनके आशीर्वाद से चौहानों के कुल नगा (नीमराना के चौहानों के भाईयों) के राज्य पर अधिकार कर लिया। शक्तिसिंह का एक पुत्र राघवदास नीम्बाहेड़ा (मारवाड़) में चला गया और महेशदास के ज्ञानपुरा, चैनपुरा, कुण्डली, वाली, चौपड़ा आदि गांव रहे। -
 
तेजसिंह के पुत्र मानसिंह के नारायणदास और नृसिंहदास हुए। नारायणदास ने अपने नाम पर नारायणपुरा बसाया। नृसिंहदास के अधिकार में खरबड़ी, चतुरपुरा, पृथ्वीपुरा, करागा, भैलसाना तथा पापरड़ी का ठिकाना रहा।
 
 
नारायणदासके बलभद्र पुत्र थे। बलभद्र बड़ा वीर और नीतिवान था। वह भदौरगढ़ क्षेत्र (संभवत: भदावर) में रहा। बादशाह शाहजहाँ ने 7 फरवरी 1628 ई. में उसे 1000 जात 600 सवार का मनसब दिया था। 3 अक्टूबर 1629 में नवाब खानजहाँ लोदी के विरुद्ध भेजी गई सेना में उसकी भी नियुक्ति हुई थी। इस सेना में 16 हिन्दू मुस्लिम मनसबदार थे। बलभद्र खानजहाँ के विरुद्ध के युद्ध में मारा गया। इसके शासन काल के कई पुण्यार्थ पट्टे तथा दानपत्र उपलब्ध हैं। इसका पौत्र करणीदास या कान्हादास शाहजहाँ के समय में 500 जात 200 सवार  का मनसबदार था ।
 
 
सहसमल-यह राव रायमल का तृतीय पुत्र था। इन्हें शाहीवाड़ का ठिकाना मिला था। इनकी सन्तान सहसमल का शेखावत संज्ञा से सम्बोधित किये जाते हैं। सहसमल के एक पुत्र कर्मसिंह था। सहसमल की पुत्री मदालसादेवी का विवाह आमेट (मेवाड़) के इतिहास प्रसिद्ध रावत पता चूंडावत के साथ हुआ था। सं. 1624 के चित्तौड़ के तृतीय साके तथा जौहर में वह यमराज की जिव्हा सदृश्य प्रज्ज्वलित अग्नि ज्वाला में भस्मीभूत हुई थी। इस प्रकार अमरसर राज्य और मेवाड़ राज्य को गौरवान्वित किया था।
 
 
कर्मसिंह के दुर्जनशालर और रामचन्द्र दो पुत्र थे।
 
 
दुर्जनशाल का भाई रामचन्द्र अपने समय के उद्भट वीरों में था। सम्राट अकबर द्वारा नवाब रहीम खानखाना के नेतृत्व में दक्षिणी भारत पर प्रेषित सैनिक अभियान में रामचन्द्र खानखाना की सेना में नियत हुआ था। खानखाना शत्रु परआक्रमण करने में हीलहवाला करता रहा, पर रामचन्द्र अपने साथियों सहित शत्रु-सेना पर टूट पड़ा और भयंकर मारकाट कर वीरगति को प्राप्त हुआ। रामचन्द्र के उस भयानक आक्रमण का एक समसामयिक कवि ने बड़ी ओजपूर्ण भाषा में चित्रण किया है. …शेष अगले भाग में
 
(लेखक - देवी सिंह मंडावा )
 

तलाश

शाम होने लगी थी।

दिनभर में उन बूढ़े हो चुके सरकारी क्वाटरों के कई चक्कर लगाने के बाद, अधेड़ उम्र का वो शख्स, पास के पार्क मे बने एक सीमेंट के बेंच पर बैठ कर सुस्ताने लगा । पंक्तियों में बने उन दोमंजिला क्वाटरों की पहली और दूसरी पंक्ति के बीच से गुजरते हुये उसकी नजरें, दूसरी पंक्ति के  भूतल पर बने उस आखिरी मकान पर आकर ठहर जाती थी । उसकी बैचेन निगाहें उस मकान के हर खिड़की और दरवाजे से अंदर तक झाँककर निराश लौट आती थी।  एक जगह ठहरकर कुछ देर वो पहली पंक्ति के पहले माले पर बने क्वाटर की उस खिड़की को भी निहारने लगता जिस से दूसरी पंक्ति के भूतल पर बने मकान के मुख्य द्वार के साथ साथ आँगन भी नज़र आ रहा था । जहां से वो एक दूसरे को अपलक निहारते रहते थे ।

 उसे एक भी  चेहरा जाना पहचाना नहीं लग रहा था। वो संकोचवश मकान को ज्यादा देर तक निहार भी नहीं सकता था । लोग क्या सोचेंगे ? कोई उसे गलत ना समझ बैठे। एक  झिझक उसके पैर रोक देती । झिझक ! हाँ वही झिझक जिसने वर्षों पहले भी उसकी जुबान पर ताले लगा दिये थे । कुछ भी नहीं बोल पाया था वो उसे।  बस आँखों ही आँखों में बातें करते रहे और मुस्कराते रहे वो दोनों और इसी तरह एक साल उनके दरमियाँ से गुजर गया । दोनों एक दूसरे की आवाज सुनने को तरस कर रह गए थे। दोनों मे से किसी की भी हिम्मत नहीं हुई की कुछ कहकर इज़हार कर सके।
सालभर चले इस सिलसिले का अंत एक अंतहीन जुदाई के साथ हुआ।

आज तीस साल बाद जिंदगी के झंझावतों से निकलकर वह उसकी तलाश मे इधर दौड़ा चला आया। इस लंबे अंतराल के दौरान यहाँ काफी तब्दीलियाँ आ चुकी थी । बहुत कुछ बदल चुका था । वह दिनभर पुरानी यादों के टुकड़े समेटता रहा । पिछले तीस सालों से सीने मे ठाठें मारता सैलाब आँखों से बह निकला था । शारीरिक और मानसिक रूप से थका हुआ शरीर सीमेंट की उस सख्त बैंच पर फैल गया।  
सुबह हो गई थी ।

नगरपालिका की गाड़ी लाश को लेकर सरकारी अस्पताल जा चुकी थी ।

“विक्रम”

  

  

 

Tuesday, 3 January 2017

MDH

पाँचवी क्लास पास व्यक्ति ने खड़ा किया , अरबों का साम्राज्य !
 
 

 
टीवी पर अक्सर रोज रोज देखकर आज मन मे "महाशय धर्मपाल गुलाटी" के बारे मे जानने की इच्छा हुई। काफी पढ़ा इनके बारे मे , उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ लिख रहा हूँ। 
महाशियाँ दी हट्टी ( Mahashian Di Hatti - MDH) किसी परिचय का मोहताज नहीं । बँटवारे के वक़्त दर-बदर हुये इस परिवार मे उस वक़्त एक 23 साल का लड़का भी सियालकोट से भारत आया। परिवार का पेट भरने के लिए तांगा चलाया, मगर गुजारा नहीं हुआ। हार कर तांगा छोड़ा और अपना पारिवारिक धंधा मसाले बेचना शुरू किया , और आज वही लड़का 94 साल का "जवान" हो चुका है । हम लोग अक्सर टीवी पर धर्मपाल गुलाटी (महाशय धर्मपाल गुलाटी) को देखकर मज़ाक मे कुछ बोल देते हैं लेकिन इनके संघर्षों ने इन्हे आज इस मुकाम पर पहुंचाया है । जिसके पीछे ना उच्च शिक्षा है ना बाप-दादा की दौलत। अगर इस सफलता के पीछे कुछ था, तो वो था, इनका संघर्ष, सादगी, ईमानदारी और मसालों की गुणवता । सामाजिक कार्यों मे भी अच्छा खासा यीगदान है इनका , करीब 20 से ज्यादा स्कूल,कॉलेज,हॉस्पिटल हैं।

 
 

 
 
 

शादी-विवाह और मैरिज ।

आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...