दिल मे कुछ भाव उमड़े और जब कौतूहल बढ़ा तो ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया । ये सिलसिला अभी तक तो बद्दस्तूर जारी है। जब भी कुछ नया या पुराना कोई किस्सा दिल मे हलचल पैदा कर बैचेनी बढाने लगता है तो उसे लिखकर कुछ शुकुन हासिल होता है। मगर कभी खुद ही यादों की राख़ टटोलकर चिंगारी खोंजने की नाकाम कोशिश करता हूँ। बस यही फलसफा है ।
आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...
बहुत सुन्दर विक्रम जी ''मेरे तन्हा दिल पर होती घुसपैठ'' । अच्छी है आपकी लिखी पंक्तियां
ReplyDeleteयादों को ही तो नहीं बंधा जा सकता .... सुंदर अभिव्यक्ति
ReplyDeletenice presentation of feelings ..माँ को कैसे दूं श्रद्धांजली
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ReplyDeleteमेरे तन्हा मन में
निरन्तर होती है घुसपैठ
तेरी यादों की,
और देर तक होता है संघर्ष
टूटे ख्वाबों को लेकर …
आखिरकार
पानी ज्यों बहते है अश्क दोनों के…
बहुत सुंदर विक्रम जी !
बेहतरीन !
संवेदनशील रचना !
वाऽह ! क्या बात है !
…आपकी लेखनी से सुंदर रचनाओं का सृजन ऐसे ही होता रहे …
शुभकामनाओं सहित…
बहुत सुंदर....काश यादों को बांधा जा सकता ।
ReplyDeleteबहुत सुंदर...
ReplyDeleteवाह...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर...
कोमल सी कविता..
सादर
अनु
बहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत बढ़िया रचना
ReplyDeleteकोमल भाव की रचना...
ReplyDeleteअति उत्तम प्रस्तुति....
:-)
बहुत सुंदर भाव ....सुंदर रचना ....!!
ReplyDeleteउधर तुम ,
ReplyDeleteअपनी यादों को
बांध के रखो ,
और इधर में,
करता हूँ कोशिश
बहलाने की,
इस मासूम
दिल को।
अहा ये नाजुक सी कविता ।
बहुत खूब ... पर यादें किसके रोके रूकती हैं ...
ReplyDeleteचली आती हैं बिन बुलाये बिन भेजे ...
कोशिश तो कर लेंगे पर सफलता इतनी आसान नहीं होगी दिल को बहलाने की :)
ReplyDeletebahut khoob likha hai aapne,
ReplyDeletevivek jain,
करता हूँ कोशिश
ReplyDeleteबहलाने की,
इस मासूम
दिल को।
क्या बात है। बहुत ही सुन्दर रचना।
शुभकामनाओं सहित आपका संजय सिंह जादौन